Monday, October 28, 2019

पर्व है दीपों का




      पर्व है दीपों का

दिवाली की अगली भोर ,
देख मैं रह गया भौंचक्का।
बालकनी के कोने में,
सहमा कपोत मैंने देखा।
रात्रि के अंधियारे में ,
न जाने कब आ बैठा ?
देख मेरी ओर मानो 
व्यथा कुछ यूँ था कहता।
''पटाखों की धुंध में, 
अपना शिशु मैं खो बैठा ।
ध्वनि, वायु प्रदूषण का 
देखो प्रभाव है कैसा ?
घर तो मेरा छीन लिया 
ये बुद्धिजीवि है कैसा?''
कंकड़ पत्थर के मकानों ने 
सुकून हमारा है छीना ।
हिय पत्थर का हो गया जिसका 
सिर्फ़ सोचता है वह खुद का ।
पलकें गीली हो गई मेरी
पीड़ा महसूस कर जब देखा।
दीपावली पर्व है दीपों का
ध्वनि प्रदूषण फिर कैसा?
राम युग रहा नहीं अब
कलयुग है यह कैसा ?
आने वाली पीढ़ी व
बुजुर्गों के विषय में भी,
नहीं कभी है यह सोचता।
सिर झुका वह निवेदन करता
''दीप जला जीवन रौशन कर ,
खुशियों से घर का कोना /''







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