Monday, May 30, 2016

जीवन मजाक नहीं (कविता)


वास्तविकता से परे हम नहीं रह सकते,
बनावटी जीवन, पर्दे पर ही सीमित हो सकते।
सच्चाई से मुख मोड़कर, नहीं अग्रसर हो पाएँगें,
पर दूरदर्शन पर वास्तविकता कैसे यूँ दिखलाएँगें?
जीवन मृृत्यु में भी तबदील हो जाएगी कहीं,
गर यूँ ही झाँकते रहे, दूसरों के जीवन में सभी।
माना जीवन में कुछ खट्टे-मीठे पल भी गुजरते हैं,
पर क्यों रियलिटी-शो बनाकर,उसे प्रस्तुत करते हैं।
दूसरों को परखने से पहले,स्वयं से क्यों भ।गते हो?
ईश्वर सूत्रधार है,धरा की इस रंगमंच का
लोग कैसे थाम सकते हैं ? डोर दूसरों के जीवन का।
आओ बढ़ाएँ कदम मिलकर, बनाएँ नूतन आज
न उड़ाने दें मजाक, औ न जिंदगी का करें उपहास ।
                                     
                                                                                           ----------अर्चना सिंह ‘जया‘
                                                             साहित्य गुंजन पत्रिका में , इंदौर सें प्रकाशित हो चुकी है।

Sunday, May 29, 2016

हिन्दी हैं हम (कविता )


देवनागरी लिपि है हम सब का अभिमान,
हिन्दी भाषी का आगे बढ़कर करो सम्मान। 
बंद दीवारों में ही न करना इस पर विचार,
घर द्वार से बाहर भी कायम करने दो अधिकार।

कोकिला-सी मधुर है, मिश्री-सी हिन्दी बोली,
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम सबकी हमजोली।
भिन्नता में भी है, यह एकता दर्शाती,
लाखों करोंड़ों भारतीय दिलों में है,जगह बनाती। 

दोहा, कविता, कहानी, उपन्यास, छंद,
हिन्दी भाषी कर लो अपनी आवाज बुलंद। 
स्वर-व्यंजन की सुंदर यह वर्णशाला,
सुर संगम-सी मनोरम होती वर्णमाला। 

निराला, दिनकर, गुप्त, पंत, सुमन,
जिनसे महका है, हिन्दी का शोभित चमन। 
आओ तुम करो समर्पित अपना तन मन, 
सींचो बगिया, चहक उठे हिन्दी से अपना वतन। 

                                                                                            ----- अर्चना सिंह जया
                                                                    12 सितम्बर 2009 राष्ट्रीय सहारा ‘जेन-एक्स’ में

Friday, May 27, 2016

डोली चढ़ना जानूँ हूँ (कहानी)


                                                                कहानी
                                                     
        संध्या की बेला घर आँगन में चहल-पहल, चारों ओर रौनक ,बिटिया की शादी जो थी और मैं एक दीवार पकड़ कर बैठ ,आसमान देखने लगी। न जाने मन मुझे किस ओर ले जा रहा था ? दिसम्बर का महीना था,शायद बेटी की विदाई की चिंता थी। नहीें ,वो भी नहीं। फिर आज अकस्मात् ही माँ की याद कैसे आ गई ?माँ शब्द  मुझे कभी सुकून नहीं देता था, तब भी वर्षो  पीछे मेरा मन आज मुझे ले उड़ चला। वैसे देखा जाए तो माँ ने मुझे जन्म तो जरूर दिया था पर शायद कुछ बात तो थी जो मुझे रह रहकर बेचैन कर देती थी।क्यों माँ के प्यार को मैंने कभी महसूस नहीं किया ?न जाने कई प्रश्न समय असमय मुझे परेशान करते थे। माँ के स्नेह के स्पर्श की चाह आज भी क्यों मन में बनी हुई थी ?तभी एक प्रश्न स्वयं से किया ,क्या मैंनेे अपने माँ होने का फर्ज निभाया है ?इस बात का जवाब मुझे कौन देगा ?
      तभी सहसा ही मैं चौंक गई, मेरी बिटिया ने मुझ पर शाल  डालते हुए कहा,‘‘ माँ,आप तो अपना ध्यान बिलकुल ही नहीं रखती हो। कल मेरे जाने के बाद क्या होगा? सबका ध्यान तो रखती हो और स्वयं के लिए लापरवाह हो जाती हो।’’ इतना कहते ही झट से गले लग कर रो पड़ी। माँ और बेटी का अर्थ मैं तब कुछ-कुछ समझ रही थी लेकिन इतनी उम्र निकल जाने के पश्चात्  ये कैसी विडम्बना थी? मुझे मेरी माँ के स्नेह के स्पर्श की  चाह आज भी क्यों मेरे मन में बनी हुई थी ? आज की रात गुजर जाएगी तो कल की सुबह आएगी जो कोलाहल से भरा संवेदनपूर्ण  होगी। मुझे मेरी बेटी की विदाई करनी है ,न जाने कितने सपने मैंने अपनी बेटी के लिए देखे थे। सारा घर रिश्तेदारों  से भरा था फिर भी मैं खुद को उस एक पल के लिए अकेली महसूस कर रही थी। ऐसा क्यों था? पति भी कार्यभार संभालने में व्यस्त थे तथा अतिथियों की आवाभगत करने में लगे हुए थे। 
        मुझे अपने बचपन की वो शाम  याद आ गई जब हम दो बहनें और दो भाई आपस में लड़ते झगड़ते थे। तभी माँ- बाबूजी की डाँट से सिमट कर एक-एक दिशा  में जाकर बैठ जाते थे। मैं अपनी दीदी से दो साल ही छोटी थी। दोनों भाई मुझसे भी छोटे थे। माँ बाबू जी की सोच में लड़के ही घर का चिराग हुआ करते थे। हम दो बहनें जैसे एक दूसरे को ही बड़े करने में सहायक थीं। माँ ने हम दोनों बहनों को ज्यादा समय के लिए गाँव में ही रखा। हमारी पढ़ाई उनकी नज़र में कोई विशेष  अर्थ नहीं रखती थी। लड़कियाँ पढ़कर क्या करेंगी ? उन्हें घर ही तो संभालना है इस प्रकार की बातें घर में हुआ करती थीं। आज मैंने अपनी बेटी को बी ए ,एम ए करा दिया है। अपने फर्ज को मैं निभाने की कोशिश  कर रही थी।
        आज मेरा मन न जाने क्यों  व्याकुल-सा हो रहा है? माँ की कई खट्टी-मीठी बातें याद आ रही हैं। मैं और मेरी दीदी दोनों ही आठ साल की उम्र से ही दादी, चाचा, चाची, बुआ के साथ गाँव में ही रहते थे। माँ ने कभी अपने साथ रखने की जरूरत ही नहीं समझी या  यूँ मैं समझूँ की उन्हें हम दोनों बहनों से कोई विशेष  लगाव ही न था। चाची जी की भी दो बेटियाँ ही थीं जो हमसे भी छोटी थीं। बचपन न जाने कब गुजर गया और हम दोनों बड़े हो गए। जब कभी मैं माँ को याद कर रोने लगती, दीदी अपनी गोद में मेरा सिर रखकर सहला देती और ढेर सारा स्नेह बिखेर देती। मैं जब कभी माँ को भला बुरा कहती दीदी मुझे डाँट देती और समझाती की माँ को ऐसा नहीं कहते। चाची भी सुन लेती तो मुझे समझाती, प्यार से कहती थीं कि मेरी तो चार बेटियाँ हैं। माँ बाबूजी की मजबूरी समझो ,वहाँ तुम सब को वे कैसे रख सकते हैं ?
      आज जब मैं पचपन साल की हो गई हूँ तो मेरा मन मुझसे ही सवाल करता है। माँ बाबूजी की ऐसी क्या मजबूरी रही होगी , मेरा मन सहजता से नहीं मानने को तैयार होता है। दीदी की शादी  भी चाचा चाची ने मिलकर तय कर दी। माँ बाबूजी पाँच दिन पहले आए और दीदी के हाथ पीले कर देने की तैयारी करने लगे।दीदी की विदाई के दिन मैं खूब रोई, जैसे मेरे शरीर  से आत्मा को अलग किया जा रहा हो। माँ बाबूजी के पास जाकर मैं खूब रोई और साथ चलने की जिद्द कर बैठी। माँ की बातों से मेरा मन टूट गया वो चाची जी से कह रही थी, ‘इसके लिए भी अब लड़का खोजना शुरू कर दे। वरना दीदी को ही याद कर रोती रहेगी।’ बाबूजी ने कहा,‘ रो मत बाँवली आम के मौसम में हम फिर आएँगें। तुम्हारे भाई भी तो, तुझ से मिलने को परेशान  रहते हैं।' जानता है छोटे ,मास्टर जी इन दोनों की तारीफ करते नहीं थकते हैं। वे कहते हैं कि दोनों बेटे नाम कमाएँगे । बस इनकी जिंदगी बना दूँ तो मेहनत सफल हो जाए। समय जैसे रेत की तरह हाथ से निकलता जा रहा था। सब कुछ फिर धूमिल होता नजर आ रहा था। अगले ही दिन माँ बाबूजी सभी चले गए।
      मेरे अकेलेपन का साया मुझे घेरता ही जा रहा था। तभी मेरी बेटी जिसकी शादी  थी चाय लेकर आई और गले लग कर बोली, ‘ माँ कल से अपना ध्यान रखना, मुझे डोली में बिठाकर अपना मन छोटा मत करना। जब याद करोगी मैं मिलने आ जाऊँगी।’ मुझे विदा करने का सपना, आप दोनों ने ही तो देखा था। ‘ बिटिया जरा इधर भी सुनना’- पति  ने आवाज लगाई।  बस तभी मुझे अपनी विदाई याद आ गई/
      गर्मी का माह था, दीदी जीजाजी आ गए थे। घर रिश्तेदारों से भरा था, सभी के चेहरे पर रौनक थी सिवाय मेरे। आँगन में गीत संगीत का माहौल था। चाची और माँ मुझसे मिलने कोहबर में, जहाँ नव वरवधु को बैठाते हैं, मिलने आईं।चाची फूट फूटकर रो रही थीं। कल से ये घर-आँगन सूना हो जाएगा, बिटिया ससुरालचली जाएगी। तभी माँ भींगी पलकें लिए मेरी ओर बढ़ी और कहने लगीं,‘ कल बेटी को डोली में बिठाना है ये यकीन नहीें हो रहा है।’ न जाने माँ की बात कानों में पड़ते ही मैं क्यों तीव्र हो उठी और पलटकर जवाब दी, ''क्यों माँ अब आने की क्या आवश्यकता  थी ? मुझे डोली में चढ़ने का ढ़ंग आता है,स्वयं ही चढ़कर ससुराल भी चली जाऊँगीं।'' मेरा ये कहना ही था कि कमरे में सन्नाटा सा छा गया। मैंने अपना दिल हल्का करने के चक्कर में माँ के दिल का बोझ शायद  बढ़ा दिया। 
    तभी पानी की कुछ बूँदें चेहरे पर गिरीं मैं  ख्यालों से बाहर आई  , मेरे पति ने हाथ बढ़ाते हुए कहा,‘सरला यहाँ अकेली बैठी क्या सोच रही है, चलो उठो। कल हमें अपनी बेटी को डोली में विदा करना है।’ मैंने नजरें उठाई तो जैसे आज मेरे जीवन के सपने अपनी बाहें फैलाए खड़ी थी। बड़ी बेटी भी बाहें फैलाए थी, सभी को मेरी चिंता हो रही थी। सभी अपना प्यार प्रकट कर रहे थे और जो छोटी बेटी 12वीं में थी वो गले से लग गई। बेटियों का ये प्यार देख मुझे अपने परवरिश  पर गर्व होने लगा। आज मैं माँ के दायित्व को निभाकर और बेटियों का लाड पाकर पूर्ण संतुष्ट थी।            

                                                                                          -------   अर्चना सिंह ‘जया’

Tuesday, May 24, 2016

धरा की पुकार (कविता)

मुझे बचाओ मैं !               
खतरे में हूँ और आप भी ।
पृृथ्वी रह-रहकर गुहार है लगाती
मैं ही तुम्हारी पालन हार
रक्षा का व्रत लो न करो संहार।
अनगिनत सपने मैं भी हूँ बुनती
हरी मखमली चादर हूँ ओढ़े।
जो स्नेह झरने न फूटते हमसे
तुम अवाक् रह जाते वंश बढ़ता कैसे ?
सहसा स्मरण हो आया मुझे
उन सुनहरे दिनों का जब था।
आँगन हरा-भरा, श्यामल कोमल
चरणों के नीचे सागर लहराता था।
पवन के साथ लहरें गातीं थीं।
बगिया चमन का महकता और
कोयल अमिया पर कूका करती थी।
अब तन-मन हो चला है बंजर
सूखी पलकें, दर्द उर में है दबा।
चीख न सुन पाते तुम मेरी,
शीशे सा मन तार-तार है हुआ
दामन भी न पाक रहने दिया।
जो सोचते तुम मेरे अस्तित्व के
विषय में भूलकर भी कभी
दूषित  न होने देते स्वच्छ आँचल यूँ ही ।
तुम्हारी ही बेटी,बहन हूँ मैं और
अब मॉं बन, सब सहे जा रही  हूँ पीड़ा
भू ,वसुंधरा,वसुधा ,भूमि ,
धरा नाम तुमने ही है दिया
फिर सेवक बन करो तुम सेवा।
रक्षक बन क्यों चीर हरते हो मेरा ?
मरुभूमि फिर न बनने देना तुम
सदा आभारी रहूँगी मैं तुम्हारी।
वसुधा नाम से जानी जाऊँ
घर आँगन सुनहरा बनाकर-
माँ तुम्हारी कहलाऊँ और
जाऊँ तुम पर वारी- वारी
मानवता का वस्त्र धारण जो कर लो ।
शायद तब न चीख सुनाई दे हमारी
मुझे बचाओ ! मुझे बचाओ !
मैं अबला असहाय बेचारी !      
                                                                                                     ---- अर्चना सिंह‘जया’
                           
                                    Published in Sahitya Gunjan Patrika, from Indore.


Sunday, May 22, 2016

नमन है श्रद्धा सुमन (कविता)


सतकर्म कर जीवन किया है जिसने समर्पित,
उन्हीं के मार्ग पर चल, उन्हें करना है गर्वित।
माता -पिता व गुरुजनों का मान बढ़ाया जिसने,
अब कर जोड़, शीश नमन उन्हें करना है हमने।
वतन को अब रहेगा सदैव उन पर अभिमान ,
बच्चे ही नहीं बड़े भी उन्हें करते हैं सलाम।
‘भारत रत्न 'भी कहलाए श्री अब्दुल कलाम,
श्रद्धा सुमन अर्पित करेंगे, मानव उम्र तमाम ।
वैज्ञानिक, तर्कशास्त्री, मार्गदर्शक भी कहलाए वे,
भारतीय होने के सभी फर्ज शिद्द्त से निभाए वे।
‘मिशाइल मैन ' के खिताब से भी नवाजा गया,
व्यक्तित्व जिसका वतन का दामन महका गया ।
जमीं का तारा आसमॉ का सितारा हो गया ।
मानवता का पाठ पढ़ाकर शून्य में विलीन हो गया ।
उदारता से परिपूर्ण था, हृदय जिसका सदा,
सर्वोच्च शिखर प्राप्त हो ऐसा व्रत लिया ।
लगन औ मेहनत के मिशाल बने स्वयं वे,
जो न सोने दे, ऐसा स्वप्न सदैव देखा किए ।
सुनहरे सफर में ‘अग्नि  ,‘पृृथ्वी  और ‘आकाश  साकार किया,
‘सुपर पावर  राष्ट् हो, सोच पूर्ण योगदान दिया ।
सादा जीवन उच्च विचार का आभूषण धारण कर,
सम्पूर्ण जीवन देश के नाम न्योछावर किया ।
युवाजन अब चलो उठो, प्रज्ज्वलित करो मशाल
स्वर्णिम भारत का मन में अब कर लो विचार ।
जो समााज का स्वेच्छा से करते हैं उद्धार,
ऐसे शिक्षकों को है हमारा  बरहम्  बार प्रणाम ।
                                                                    श्री ए पी जे अब्दुल कलाम को श्रद्धांजलि
                                                                                          ---------- अर्चना सिंह ‘जया’
---Published on 5th Sept. 2015 in National Duniya Newspaper

Saturday, May 21, 2016

खुला आसमान (कहानी)

कहानी
                     
   संध्या की बेला और बाहर हल्की बारिश , मैं खिड़की से सटी हुई पलंग पर बैठी बाहर देख रही थी। पत्तों पर गिरती पानी की बूँदें निश्छल स्वच्छ सुंदर चमकदार नजर आ रही थी । नजरें जैसे नन्ही-नन्ही बूँदों पर टिकी हुई थी कि तभी राशि ने मुझे आवाज लगाई,‘ दादी ,आप क्या कर रही हो ? मुझे एक अनुच्छेद लिखवा दो न।’
मैंने विनम्रता से कहा,‘जाकर अपनी मम्मी से लिखवा लो न। मुझे क्यों परेशान कर रही हो ? उस दिन अनुराधा घर पर ही थी, मन कुछ अनमना होने के कारण ऑफिस नहीं गई थी।
राशि ,मेरी पोती बहुत ही प्यारी सातवीं कक्षा में पढ़ती है,उसकी माँ बैंक में कार्यरत है यानि मेरी बहू अनुराधा। मेरा बेटा नवीन प्राइवेट सेक्टर में कार्य करता है। दोनों ही मिलजुल कर काम करते ,विचारों के सुलझे हुए हैं। कभी अगर नोंक झोंक हो भी गई तो एक दूसरे से सुलह भी पल में ही कर लेते हैं। नवीन कॉफी बना लाता और फिर दोनों हँसते हुए कॉफी पीने का आनंद लेते। अनुराधा समय से ही घर आ जाया करती है कभी अगर देर हो भी गई तो नवीन उसे लेने चला जाता। छुट््टी के दिन हम सभी कभी लूडो या कैरम खेलते, कभी सीडी में नई फिल्म देखते। किन्तु मैं सभी फिल्में नहीं देखती , एक ही घर में रहते हुए भी उन तीनों को अपनी जगह देने का प्रयास करती हूँ। आज भाग दौड़ की जिंदगी में पति-पत्नी को अपनी जगह तो चाहिए ,ताकि नजदीकी बनी रहे। आखिर उनकी खुशी में ही मेरी भी खुशी है। राशि को कुछ-कुछ चीजें मेरी ही हाथों की अच्छी लगती है, जैसे हलवा, मठरी, गुझिया, नारियल के लड््डू ।
      राशि ने मेरी चुन्नी खींची और कहा,‘दादी, आप मेरी हिन्दी टीचर हो और आपकी वजह से ही मुझे हमेशा अच्छे अंक आते हैं। मैंने सोचा अब ये यूँ नहीें मानेगी, मुझे लिखवाना ही होगा। मैं हिन्दी की अध्यापिका रह चुकी थी, 18 वर्ष  तक मैंने भी सर्विस की किन्तु अब कमर दर्द को लेकर परेशान रहने लगी थी। मैंने सर्विस जरा देर से आरम्भ की जब मेरे तीनों बच्चे स्कूल जाने लगे। वे स्वावलम्बी हो गए थे , मुझे सिर्फ उनके खाने की चिंता हुआ करती थी। आज दोनों बेटियाँ अपने ससुराल में स्वस्थ व खुश हैं। मैंने राशि से पूछा, ‘अच्छा ! अब बता किस विड्ढय पर अनुच्छेद लिखना है?’ राशि खुश हो कर बोली, ‘परिवार का महत्व’। सबसे पहले तुम ये बताओ कि परिवार का अर्थ तुम्हारी दृृष्टि में क्या है? फिर तो मैं तुम्हें लिखवा ही दूँगी। उसने बड़े ही सुंदर और सहज भाड्ढा में अपनी बात कहनी आरम्भ कर दी। मैं उसकी बातों को धैर्यता से सुन रही थी किंतु सुनते-सुनते ही मैं कहीं और खो रही थी।
      सच ही कहा है बाल मन बहुत ही कोमल होता है उनकी अपनी सोच अपने नजरिये होते हैं। शायद हम बड़े कभी भी उनकी नजर से बातों को समझने को तैयार नहीं होते और न ही छोटों को अपनी राय देने की इज़ाजत देते हैं। बच्चे दिल से  निर्णय भावुकता वश अवश्य लेते हैं किन्तु हम बड़े बुद््धिजीवी कुछ अनुचित निर्णय ले लेते हैं। आज मुझे अपने स्कूल के वो दिन याद आ गए जब मैं 7 वीं कक्षा ब को हिंदी पढ़ाती थी। मुझे बच्चों से बेहद लगाव था? एक दिन मैंने कक्षा के सभी बच्चों से परिवार के विड्ढय में पूछा कि उनके घर पर कितने सदस्य रहते हैं और उनसे रिश्ता क्या है? सभी बच्चे  उत्सुकता व्यक्त करते हुए अपनी-अपनी बातें कहने लगे। कई मुख्य जानकारी बच्चों से मिली और उसी में मैंने कुछ बातें जोड़ते हुए कई जानकारी और भी दी। कक्षा में दो पक्ष बना कर एकल परिवार व सामूहिक परिवार पर चर्चा की गई। चर्चा समाप्त करते हुए मैंने उन सभी बच्चों को गृृहकार्य दे दिया। ‘परिवार के महत्व’ के विड्ढय पर लिख कर लाएँ।
   अगले ही दिन बच्चे गृृहकार्य पूरा कर लाए और सभी अपनी कॉपी को एकत्रित कर स्टॉफ रुम में मेरी मेज पर पहुँचा गए। मैं अपनी समय-सारणी के अनुसार ही थोड़ी-थीड़ी कॉपी की जाँच आरम्भ कर दी। दूसरे ही दिन अचानक एक कॉपी मेरे हाथ आई नाम रेणू था, उसके अनुच्छेद लेखन को पढ़ी तो आश्चर्य चकित रह गई। उसने अपने अनुच्छेद में अपने परिवार की चर्चा करते हुए कई ऐसी बातें लिख गई थी जो हम बड़े होकर भी नजर अंदाज कर देते हैं। अनुच्छेद की कुछ लाइनें इस प्रकार थीं, हमारे घर में तीन ही लोग हैं । सभी अपने -अपने कमरे में रहतें हैं, बात करने या हँसी की कोई आवाज नहीं आती अगर कुछ सुनाई देती है तो पापा के लड़ने की आवाज । मम्मी खामोशी से शांति बनाए रखने के लिए सब बातों पर पर्दा डाल देतीं हैं। पापा प्रतिदिन देर से आते और कुछ न कुछ बहाना खोज कर मम्मी से लड़ पड़ते हैं। मैं चाह कर भी कुछ नहीं कह पाती, वरना मुझपर हाथ भी उठा देते । पर्व त्योहार पर भी हमारे जीवन में रंग नहीं भर पाते। पापा को.......  इतना पढ़ना ही था कि तत््काल ही मैंने रेणू को बुलवाया और अकेले में उससे बात की। मैंने पूछा,‘ रेणू तुमने अनुच्छेद में क्या लिखा है? रेणू चुपचाप खामोश सी हो गई। मैंने अपने करीब करते हुए बहुत प्यार से पूछा, क्या बात है? रेणू की बातों में बगावत स्पष्ट नज़र आ रही थी, मुझे उस घर में नहीें रहना , पापा अच्छे नहीं हैं । मम्मी सारे दिन काम करती और पढ़ाई में भी मेरी मदद करती है। देर रात खाने पर पापा का इंतजार भी करती हैं पर पापा सदा ही नाखुश रहते । साथ ही मम्मी के हाथ में खर्च करने को पैसे भी नहीं होते हैं। मैं उस चोट खाई बाल मन की पीड़ा को समझ रही थी , उसे अपनी बातों से समझाने का प्रयास कर रह थी।
   कहते हैं बच्चों का मन नन्हें पौधों की तरह होता है उसकी देखरेख जिस प्रकार की जाए वैसा ही बढ़ता है । कहीं न कहीं परिवार के माहौल का प्रभाव बच्चे पर पड़ता ही है। अब मैं हरदिन रेणू से मिल कर एकांत में बात करती थी और उसे समझाती कि तुम्हें अपनी मम्मी के लिए एक अच्छा इंसान व आत्मनिर्भर बनना है। रेणू ने मेरी बातों को समझते हुए कहा,‘ मैं आत्मनिर्भर हो कर मम्मी को सारी खुशियाँ दूँगी।’
      राशि ने मुझे हिलाते हुए कहा,‘ दादी आप तो मेरी बातें सुन ही नहीं रही हो मैं दोबारा से नहीं कहूँगी अब आप ही पूरा अनुच्छेद लिखवाइएगा। राशि ने मम्मी से शिकायत की कि मम्मी देखो न दादी मेरी मदद ही नहीं कर रही है। तभी अनुराधा मेरी चाय की प्याली लेते हुए आई शायद उसने मेरी नम आँखें देख ली और राशि को कुछ अन्य विड्ढय पढ़ने के लिए कही। अनुराधा मुझसे पूछ बैठी ‘क्या हुआ माँ आप कुछ परेशान हो?’ मैंने रेणू दास के विड्ढय में बात करते हुए उस घटना का जिक्र कर दिया।  अनुराधा भी भावुक  हो उठी किन्तु दूसरे ही पल उसने पूछा ,‘ रेणू कहाँ की रहने वाली थी ? देखने में कैसी थी ? मैंने बताया  कि रेणू दास की आँखें नीली , घुँघराले बाल,छोटे कद की और लिखावट सुंदर हुआ करती थी। अनुराधा ने कहा ,‘ माँ, आप चिंतित न हों। आप के आशीड्ढ से वो अवश्य ही जीवन में सफल हुई होगी। ’ ये कहते हुए अनुराधा बालकनी में चली गई और फोन पर किसी से बातें करने लगी। मैं अपना मन बहलाने के लिए राशि के पास चली गई।
    तभी आधे घंटे में अनुराधा ने आवाज लगाई,‘मम्मी जी कोई आप से मिलने आया है।’ मैं सोच में पड़ गई कि इस वक्त तो मेरी सहेलियाँ योगा क्लब में जातीं हैं कौन मुझसे मिलने आया होगा ? मैं जैसे ही डाइंग रुम में आई, देखी एक मेरी ही बहु के उम्र की लड़की सामने खड़ी थी जिसकी शकल कुछ-कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी। वो आगे बढ़कर मेरा पैर छूई और कहा , मैम मुझे पहचाना नहीं, मैं रेणू। रेणू दास। मैं बिल्कुल स्तब्ध सी रह गई। ये कैसे मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मैं कभी अन्नु की ओर देखती तो कभी रेणू की ओर। माँ मैंने जब आपकी बात सुनी तो मुझे शक हुआ फिर मैं रेणू को फोन कर सारी बात बताई। हाँ, मैम और फिर मैं तो खुद को रोक नहीं पाई। मैं और अनुराधा एक ही साथ एक ही ऑफिस में हैं।
     रेणू और मैं गले मिले , फिर मैंने माँ और पिता के विड्ढय में पूछा कि कैसे हैं? रेणू पूर्ण रुप से संतुष्ट व खुश नजर आ रही थी। उसने कहा,‘ मैम,आप मेरे घर पर आओ माँ से मिलवाऊँगी। फिर मैंने टोकते हुए कहा, पापा कैसे हैं? पापा की तो बात ही मत करिए वो अब हमारे जीवन में नहीं हैं, उन्होंने हमें छोड़कर दूसरी शादी कर ली। रेणू ने आँसू छुपाते हुए कहा,‘ कोई नहीं मैम जो होता है अच्छे के लिए होता है। हमारे जीवन में अब खुशी के पल लौट आए हैं, मुझे खुला आसमान मिल गया है। अब हम खुली हवा में साँस ले रहे हैं। अनुराधा मैम, मैम को लेकर घर पर जरुर आइएगा। कल रविवार है, हम साथ मिलकर दोपहर का खाना खाएँगें। माँ भी आप से मिलकर बहुत खुश होगी। रेणू की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा।

                                             -अर्चना सिंह जया 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (कविता)

हम ही हैं माँ का गर्व,          
हम ही हैं पिता का गौरव ।
मान-सम्मान है हमीं से
तुम्हारा हौसला और गुरूर हमीं से।
बुलंदियों को छूना जानते हैं।
मत समझो कम किसी से ।
क्यों बाँधने चले नदी को?
क्यों रोकते पवन की गति को?
खुलकर जीने दो, जीने दो
जमीं ही नहीं आस्माँ भी छूना जानती हूँ।
मत समझो कम किसी से ।
घर सम्भाला, मान-मर्यादा सम्भाली
शीला-विज्जा, रुक्मिणी ,शकुंतला ने।
विदुषी  ही नहीं, सशक्त थीं नारी तब भी
गार्गी के व्याख्यान से हुए परास्त सभी।
मत समझो कम किसी से ।
हम ही हैं जो हिम पर्वत पर
राष्ट्ध्वज लहराने का दम भरते हैं।
चाँद पर कदम रखकर हम 
देश की मिट्टी को गौरवांवित कर सकते हैं।
सिर ऊँचा कर राजपथ पर हम चलते हैं,
मत समझो कम किसी से ।
ना दुर्गा ,ना काली रूप
मानवता के रूप में जन्मी हूँ
भू लोक में मान बढ़ाने वाली।
फिर क्यों भ्रूण हत्या कर 
नहीं देखने देते स्वपनिल आकाश ?
क्यों समझते हो कम किसी से आज ?
जिंदगी की धूप छाँव का
जीकर करने दो एहसास
ख्वाबों और ख्यालों में ही क्यों ?
स्वच्छंद जीने दो, उड़ना चाहती हूँ अनंत आकाश।
नायडू ,टेरेसा ,बेदी, गाँधी-सा है विश्वास।
मत समझो कम किसी से आज।
जिस नाम से अब चाहो पुकार लो,
लक्ष्मी, आशा-लता, सानिया,
अरूणधति ही नहीें मात्र ;चावला ,ऊषा,मेरीकॉम
मॉ के कोख का बढ़ाकर मान
राष्ट् ही नहीं विश्व करेगा जिन्हें सलाम।
जन-जन में गूॅज लहरा देंगे 
परिवार ही नहीं राष्ट् व विश्व की हैं शान।
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
बिटिया  भी है देश का अभिमान,
बिटिया है देश का अभिमान।
                                                                         ------- अर्चना सिंह‘जया’
                        
                             10 जनवरी 2016 राष्ट्रीय  सहारा पेपर, पेज -11मंथन पर आ चुकी है।