Thursday, February 4, 2021

खुद को कहते किसान

 किसान की रैली क्यों शर्मसार कर गई ,


हिंसा को बढ़ावा देकर तलवार हाथ में थाम,


लोकतंत्र की आड़ में ऐतिहासिक कहानी लिख गई।


लाल किले के दामन पर कर तांडव नृत्य, 


किसान ने क्यों थामा अराजकता का हाथ,


"अहिंसा परमो धर्म" जिस देश की है शान, 


किसी भी समस्या का हिंसा नहीं है समाधान।


किसानों ने शर्त से मुकरने का इतिहास रच दिया।


किस भेष में छुपे हुए उपद्रवी तमाम,


खुद को कहते हैं वे किसान।


जनता की सम्पत्ति को तहस-नहस करना,


देश में अशांति का वातावरण बना दिया।


क्या किसानों का यह शोभनीय है व्यवहार? 


जमकर हंगामा,बवाल मचा कर खड़ा किया सवाल।


शोभनीय दिवस में अशोभनीय व्यवहार मानव का,


किसान अपने व्यक्तित्व को यूं तार तार कर रहे ,


हरियाली का प्रसार करने वाले, क्यों हथियार थाम रहे ?


तिरंगे को सलाम न कर, अपमान किले का कर दिया। 


राष्ट्र का हित करने वाले, हित का मार्ग त्याग दिया।


धैर्य का ध्वज छोड़ क्यों अहित का चादर ओढ़ लिया ?


"जय जवान,जय किसान" स्वर गूंजते थे जहां,


नारे के स्वर से करने लगे शंखनाद यहां ।


नारेबाजी,दंगे,फसाद हल नहीं किसी सोच का,


आपसी सहयोग, विचार है जवाब नई राह का।


क्यों हो रहे भ्रमित लोग स्वच्छ व कोमल हिय वाले,


अन्नदाता हो तुम चहेते जो देश प्रेम गीत दोहराते।


                 ----- अर्चना सिंह जया

Wednesday, February 3, 2021

दहेज प्रथा

दहेज रूपी 'सुरसा' देखो मुख खोले है बैठा,

न लज्जा,न ग्लानि, न हृदय में है कोमलता।

दान-उपहार शोभा थी, त्रेता युग में जिसकी

नैतिकता-पवित्रता मानव ने ही धूमिल की।


गांव,शहर,देश,समाज की है ये ज्वलंत प्रथा

 बुद्धिजीवी ना जाने कब समझेगा गंभीरता?

नित अखबारों में पढ़ने को मिलती है नई कथा,

माता-पिता के लिए बन चुकी है गंभीर व्यथा।


जहां अमानवीय सा हो, वर पक्ष बने हैं लोभी,

वहां बहू रूपी बेटियां, दहेज की बलि हैं चढ़तीं।

राष्ट्र और समाज की हो रही है यहां घोर क्षति,

बचाओ लाज मानवता की, बहू को समझो बेटी।


वक्त के साथ अन्य कुप्रथाएं हुईं हैं कुछ धूमिल,

पर समाज में भ्रूणहत्या के, हैं अब भी कातिल।

बेटी-बेटे किसी का मोल लगाना है घोर अपराध,

दहेज प्रथा भी है कुप्रथा, है सामाजिक अभिशाप।



वो शब्द ही तो है

 वो 'शब्द' ही तो है।

दिलों के ज़ख्मों पर मरहम लगा दे,

या नमक मसलकर ताजा कर दे।

वो 'शब्द' ही तो है।

सरगम में पिरोकर मन के तार छेड़ दें,

भावों को व्यक्त कर अधूरे बोल पूरे कर दे।

वो 'शब्द' ही तो है।

कभी उलझनों में उलझा रुला दिया करता,

कभी सुलझा कर लबों पर मुस्कान सजा दे।

वो 'शब्द' ही तो है।

भावों को स्याही से कभी सजाया ख़तों में,

और कभी पन्नों पर हिय के भाव को उकेरा।

वो 'शब्द' ही तो है।

कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक में शामिल,

वर्णों से सुसज्जित सदा ही व्यक्त कर देता है।

वो 'शब्द' ही तो है। 

गीत में, संगीत में, उपासना में, प्रार्थना में 

नाम में, व्यवहार में, आचरण में जो बोले जाए।

वो 'शब्द' ही तो है।

शांति का संदेश गुंजायमान हो स्वर में,

या आंदोलन का आक्रोश हो स्वर में।

वो 'शब्द' ही तो है।