Sunday, September 25, 2016

मंगला ( कहानी )

   

मंगल यानि जीवन में सब शुभ ही शुभ। फिर तो मंगला के जीवन में सब मंगल ही मंगल होना चाहिए पर जीवन की कठिन परिस्थितियों से जूझती मंगला जीवन के एक ऐसे पड़ाव पर खड़ी थी जहॉं उसे अपने स्त्रीत्व होने पर गर्व की बजाए अफसोस हो रहा था। हो भी क्यों नहीं ? समाज जैसे पुरुषों के ताने बाने से ही बुना गया हो जहॉं स्त्री की भावनाओं का कोई महत्व ही नहीं था।
     यह बात स्कूल के दिनों की है जब मैं चौथी कक्षा में थी ,मेरी सहेली मंगला एक दिन गुमसुम अकेली बैठी थी तभी मैंने उसके करीब जाकर टिफिन की डिब्बी बढ़ाते हुए पूछा ,‘‘क्यों आज तुम टिफिन नहीं लाई हो?’’ उसने रुवासे स्वर में कहा, ‘नहीं । भाभी मुझसे नाराज हो गईं और टिफिन नहीं दीं।’ मेरे दिमाग में प्रश्न दौड़ने लगे और मैंने पूछा,  ‘ क्यों मॉं .........’। अभी प्रश्न पूर्ण भी नहीं हुए थे कि मंगला रो पड़ी और कही, ‘ मॉं नहीं है।’ बस इतना सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन ही खिसक गई। मैं मॉ के बगैर जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। बस, स्कूल में एक मुलाकात और मित्रता का आरंभ हो गया। दोनों प्रतिदिन स्कूल में साथ-साथ ही समय व्यतीत किया करते  उसके चेहरे पर मासूमियत तो थी पर माथे पर चिंता की लकीरें स्पष्ट नज़र आतीं थीं। घर पर भाभी की डॉंट फटकार ,पिता के पास धन का अभाव और छोटे दो भाईयों की जिम्मेदारी भी मंगला के हिस्से ही आ गई थी। छुट्टी के दिन भाभी के काम में हाथ बॅटाना ,भाईयों के कपड़े धोना आदि जैसे मंगला के समय सारणी में था।
         हमारे घर का माहौल मंगला के घर के बिल्कुल ही विपरीत था। हम तीन बहनें ही थीं। हमें शिक्षा प्राप्त करने में किसी भी प्रकार की पाबंदी नहीं थी, मॉं का सहयोग बराबर ही मिलता रहा। मॉं सदा से ही हमें शिक्षा के महत्त्व को समझाया करती थीं ,स्वावलंबी बनने को प्रेरित किया करती थीं। पिताजी भी बदलते समय के साथ अपने विचारों में भी परिवर्त्तन लाते थे। मंगला की शादी बारहवीं पास होकर ही हो गई थी जबकि मेरी एम ए ,बी एड के बाद हुई थी। शादी के बाद भी मैंने पी एच डी पूरी की। मेरी शादी एक सुशिक्षित परिवार में हुई।
मंगला शादी के पश्चात्् कानपुर चली गई थी। उसका पति इंटर कॉलेज का मास्टर हुआ करता था, शादी के पॉंच वर्ष में ही दो बेटे हो गए थे। मैंने उसे पत्र लिखकर बधाई भी दी,‘‘ अब तो बड़े मजे हो रहे होंगे, ईश्वर ने तुम्हें छोटा और सुखी परिवार दिया है।’’ कई वर्ष बीत गए किन्तु पत्र का जवाब नहीं आया। धीरे-धीरे महीने, साल बीतते चले गए मैं भी अपने परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त होती चली गई। जीवन के उधेड़ बुन में वक्त का पता ही नहीं चला। मेरी बेटी भी बड़ी हो गई ,उसने एम बी ए बैंगलोर के कॉलेज में दाखिला ले लिया था। मैं जिस स्कूल में पढ़ाती थी उसमें गर्मी की छुट्टियॉं आरंभ हो चुकी थीं तो मैंने मायके जाने का निर्णय लिया। जिस ट्ेन से मैं जमशेदपुर जा रही थी उसी में मंगला भी अपने बड़े बेटे के साथ सफर कर रही थी। एक दूसरे को देखकर हमारे खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा ,मंगला के ऑंखों से ऑंसू छलक पड़े। मैं समझ बैठी कि खुशी के ऑंसू हैं पर ये मेरी भूल थी। घंटों हम दोनों ने बातें की।
           आज मैं कई बातों को समझ पाने में असमर्थ थी। सच ईश्वर किसी की परीक्षा जीवन के अंतिम पड़ाव तक लेता रहता है। ईश्वर पर आस्था की डोर कमजोर पड़ रही थी। मंगला के जीवन पर जैसे शनीचर देवता का प्रभाव हो। पुरुष प्रधान समाज में तो मेरे विचार से पुरुषों का ही दायित्व  होना चाहिए कि वह बहन,बेटी, बीवी व मॉं की जिम्मेदारी उठाए। वह स्त्री के अस्तित्व का मान रखे। आखिर समाज की प्रथा क्या है? कई घरों में अगर स्त्री बेटी को जन्म देती है तो यातनाएॅं सहती है, सुंदर व्यवहारिक कुशल नहीं है तो शादी में मुश्किलें आतीं हैं। किन्तु मंगला तो शिक्षित,कुशल और दो बेटों की मॉं थी फिर क्यों पति के प्यार से वंचित थी?
            अब स्टेशन पर उतर कर हम दोनों ऑटो में बैठ कर अपने अपने घर की ओर चल पड़े। मंगला को लेने उसके जेठ आये थे। मंगला के पति तीन भाई , ये तीसरे नम्बर पर थी। मंगला के बड़े बेटे को कुछ दिमागी समस्या थी वो उसे ही दिखाने रॉंची अक्सर आया करती थी। मैं अपने घर पहुॅंचकर मॉं को मंगला के विषय में बताई। मॉं ने कहा, ‘बेचारी मंगला और उसका नसीब।’ मॉ ने कहा,‘ समय भी लाचार व बेबस होता है उसे किसी के दुःख या सुख से कोई मतलब नहीं होता। उसे पल-पल गुजरना ही पड़ता है वो ठहरना जैसे जानता ही नहीं।’ मॉं की बातें सुनकर मैंने कहा,‘अच्छा ही है न मॉं वरना दुःख के पल थम जाए तो क्या हो?’ ‘ पर बेटा,ये क्या? मंगला के जीवन से दुःख के पल क्यों नहीं गुजर जाते हैं ? हॉं, ये प्रश्न सोचने वाली जरुर थी।
              अगली सुबह हम मेज पर साथ बैठे नाश्ता कर रहे थे पिताजी सब्जी लेने बाजार जा चुके थे। मॉं ने खीर मेरी तरफ बढ़ाया, मैं मॉं की हाथों के खीर की दिवानी थी। उसी पल मैं कुछ सोचने लगी कि मंगला ने कभी शायद ऐसे स्नेह का आनंद ही नहीं जाना होगा।
तभी मॉं ने पूछा,‘क्या बात है? किस सोच में डूब गई ?’
बस मंगला को याद कर खा रही हूॅं। मॉं ,‘क्या मैं उसे किसी दिन खाने पर बुला लूॅं?’
बेशक, जब तुम चाहो बुला लो,माँ ने कहा /
मॉं से ज्ञात हुआ कि मंगला का पति इतिहास का लेक्चरर है। वह कभी भी अपने परिवार को पटना ले ही नहीं गया, मंगला हमेशा अपने जेठ,जठानी,उनके बच्चे और सास के साथ  शहर से  बीस किलोमीटर दूर , गॉंव पर रही। पति समय असमय अपने परिवार से मिलने आ जाया करता था। शायद तनख्वाह की समस्या रही होगी, पर कुछ लोग कहते हैं कि पति का कुछ चक्कर है। दस पंद्रह वर्षों में उसने न कॉलेज बदला और न शहर ही । न ही परिवार को साथ में रखने की इच्छा ही कभी व्यक्त की।  ईश्वर ही जाने क्या सच्चाई थी? मंगला ने उस परिवार को वंश तो दिया पर वंश देने वाली का कोई कद्र ही नहीं था। उसने अपनी जिंदगी से समझौता ही कर लिया था, दोनों बच्चे ही अब उसकी प्राथमिकता थे । उन्हें शिक्षित करने में जुट गई।  
आज मैं समझने में असमर्थ हो रही थी कि आखिर समाज में स्त्रियॉ ही समझौते का पात्र क्यों बनती हैं ?मान-मर्यादा का बोझ उसे ही क्यों ढ़ोना पड़ता है? तभी फोन की घंटी बजी,
‘हेलो’ मैंने कहा।                            
 उधर से महेश की आवाज- ‘ और सुमन तुम ठीक से पहुॅंच गई न, घर पर तुम्हारे पापा मम्मी कैसे हैं ?’
‘हॉं, यहॉं सभी लोग ठीक हैं। अपना ध्यान रखना।’ मैंने कहा।
‘पापा और मम्मी का ‘चेकअप’ करवा देना। वे हमारी जिम्मेदारी हैं पैसे की जरुरत हो तो कहना। चलो बॉय।                        
              महेश , मॉ का दामाद वह बिल्कुल बेटे की ही तरह है। महेश का मानना है कि मेरे माता पिता को बेटे की कमी न महसूस हो। सच मेरे किसी अच्छे कर्म के फल होंगे जो मैंने महेश जैसा पति पाया। मॉं ने पूछा, ‘किससे बातें हो रही हैं?’ मैंने मॉं को गले लगाते हुए कहा, ‘हूॅंमम, तुम्हारे बेटे से। जो बात-बात पर तुम लोगों की खैरियत जानना चाहता है।’ तभी पिताजी ने आवाज लगाई, ‘मेरा बेटा जो ठहरा। लो थैला पकड़ो, सुमन तुम्हारे लिए गरम-गरम जलेबियॉं भी लाया हॅूं ।’ मायके का सुख क्या होता है कोई मुझसे पूछे। मंगला के नसीब में न तो मायके का और न ही ससुराल का सुख था।
               मंगला के जेठ का घर सड़क जहॉ खतम होती थी उसी के चौराहे के पास में था।  तीन दिन के बाद मैंने अपनी कामवाली से मंगला को खबर भेजवाया कि शाम को पास के पार्क में मिलते हैं । शुक्रवार की शाम पॉंच तीस के आस पास हम पार्क में मिले । मंगला की ऑंखें सूजी हुई लग रही थीं, हम दोनों ने बातें करनी शुरु की। मूॅगफली खाते-खाते हम दोनों ने पुरानी यादें ताज़ा की। मैंने उसके पति की चर्चा की तो वो जैसे उदास हो गई। कहने लगी ,‘बस कुछ और पूछ ले । इस रिश्ते में हम क्यों बंधे हैं ? ये हमें भी नहीं पता।
बस मुझे बच्चों की चिंता ही सताती है। उन्हें अपने बच्चों की भी परवाह नहीं रहती । ’
‘उन्हें कोई समझाता क्यों नहीं ? घर में जो उनसे बड़े हैं उन्हें समझाना चाहिए।
‘हमारे रिश्ते में भावुकता का कोई स्थान ही नहीं है। मैं उस परिवार की बहु तो हूॅं पर पत्नी होने का गर्व नहीं महसूस होता है।’                          
 ‘मगर तुम उस परिवार से क्यों जुड़ी ? क्योंकि तुम्हारी शादी उस परिवार के लड़के से हुई है न। ’ मेरा ये कहना ही था कि तभी उसने कहा-
‘चलो छोड़ो, अब आदत सी हो गई है। ज्यादा सोचती हूॅं तो बीमार हो जाती हॅूं।’
‘जीवनभर सिर्फ दूसरों के करने का ठेका ले रखा है क्या? तुम्हारा कोई अस्तित्व है या नहीं। मंगला ,तुम्हारे इसी आदत से मुझे गुस्सा आता है। सभी तुम्हारी अच्छाई का फायदा उठाते हैं।’
  ‘ओह हो! चल रहने दे अब। मुझे सोमवार को रॉंची में डॉक्टर से मिलना है। प्रार्थना कर की मेरा बेटा जल्दी ही स्वस्थ हो जाए।’ मंगला इतना कहते हुए मुझसे लिपट गई और उसकी ऑंखें भर आई। रुवासे स्वर में ही घर वापस जाने की अनुमति ले ली। मेरा गला जैसे भर आया, मैं भी उसे रोक नहीं पाई। हॉं, पैसे की अगर जरुरत हो तो कहना । उसका छोटा बेटा अस्वस्थ रहता था ,कुछ मंद था /       
मंगला में उदारता ,मृदुभाषी, मेहनती,परोपकारी आदि जैसे सभी गुण मौजूद थे किंतु लोगों को नज़र क्यों नहीं आता था ? मैं उससे मिलकर बेचैन हो गई थी, उसके दर्द  ने ईश्वर की आस्था को भी हिला दिया। आखिर उसके जीवन में सवेरा कब होगा ? मंगलवार की सुबह थी गौरैये की चहचहाहट के साथ सूर्य की किरणें अपनी बाहें फैला रही थीं, पिताजी हमेशा की तरह ही बाजार सब्जी लेने निकल गए।  मैं नाश्ता बनाने रसोई में मॉं के साथ चली, मॉं दोपहर के खाने की भी तैयारी साथ-साथ करने लगी थीं। जैसे ही पिताजी बाजार से आए हम साथ बैठकर नाश्ता करने लगे।    
 पिताजी ने पूछा,‘ हूॅ हूॅ ये पोहा जरुर बिटिया ने बनाया होगा।’
 मॉं ने कहा, ‘ हॉ, आपकी लडली ने बनाया है।’
‘मेरे ससुर जी को भी मेरे हाथ के पोहे पसंद आते हैं।’
‘चल सब ईश्वर की कृपा है जो तुझे इतना अच्छा परिवार मिला। बस यॅूं ही सबका ख्याल रखना ।’ पिताजी ने कहा।
सच मैं भी भगवान का शुक्रिया करने लगी। तभी मैंने सोचा मंगला तो कितना पूजा पाठ भी करती है फिर ईश्वर उसकी क्यों नहीं सुनता ? बस मन फिर से मंगला की परिस्थितियों पर विचार करने लगा। तभी मेरी दृष्टि दिवार घड़ी पर पड़ी दोपहर के 12 बजने वाले थे । एक घंटे में मंगला रॉंची से यहॉं पहुॅंचने वाली थी। मुझे इंतज़ार था कि डॉक्टर ने क्या कहा होगा ?
             अचानक  पिताजी बाहर के दरवाजे़ से घबड़ाते हुए अंदर आए और कहने लगे, ‘ईश्वर ने ये अच्छा नहीं किया।’ मॉं पिताजी को पानी देने लगी, मैं बाहर की ओर भागी कि आखिर पिताजी ने ऐसा क्या देखा-सुना ? सड़क पर कोलाहल था सभी चौराहे की ओर भागते दिखाई दिए। मैंने तभी एक व्यक्ति से पूछा,‘ क्या बात  है?’ उसने घबड़ाते हुए बताया कि सड़क दुर्घटना हुई है मॉं-बेटे दोनों ही नहीं रहे। मैं फिर भी समझ नहीं पाई। कुछ-कुछ आगे बढ़ती गई, मन व्याकुल सा होने लगा। तभी उधर से मेरी कामवाली भागती हुई आई , मुझे रोकते हुए बोली,‘ दीदी आप मत जाओ उधर नहीं देख पाओगी, मंगला और उसके बेटे का चेहरा पहचाना नहीं जा रहा है। पुलिस भी आई है।’ मैं चीख पड़ी ,‘अम्मा ये क्या कह रही हो ? कुछ गलतफहमी हुई होगी तुम्हें ।’ ‘मंगला के साथ इतना भी बुरा नहीं हो सकता’ कहते-कहते मैं बेसुध हो गई।                                                          
 रात में जब मेरी ऑंखें खुलीं तो मैं स्वयं को अपने बिस्तर पर पाई, मॉं- पिताजी पास में ही बैठे थे। मॉं ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,‘ जो ईश्वर की इच्छा। उसके आगे हमसब बेबस हैं।’ मैं फूट-फूट कर रोने लगी, मॉ ने बहुत समझाया। मैं समझने की कोशिश कर रही थी पर मेरे सवाल अभी भी वही थे कि क्या मंगला के जीवन में कुछ मंगल था भी कभी ? वो सिर्फ नाम की ही मंगला थी।
                                                       
                                                                                               ---------- अर्चना सिंह‘जया  
                                               

Monday, September 19, 2016

एक शाम (कविता )


पंछी भी मुख मोड़ चले
अपने नीड़ की ओर।
मैं खड़ी अटेरी पर
थामें  शाम की डोर।
मन व्याकुल हो चला
पी का कहॉं है ठौर ?
ये एक शाम की बात नहीं
नित हो जाती भोर ।
    पलकें रह-रह राह बुहारती
    कंगन भी करतें हैं शोर।
    कब ऑंखों की प्यास बुझेगी ?
    कब नाचेगा मन मोर ?
    ये एक शाम की बात नहीं
    नित मन होता भाव विभोर।
किस दिगंत आवाज लगाऊॅं ?
सुन ले ना कोई और
मन का पीर मन ही जाने
पिय न समझे,न कोई और
चार पहर है गुजर चुका
कब गूॅंजेगा मधुकर का शोर?
ये एक शाम की बात नहीं
नित हो जाती भोर ।                  
                       
                                         -------अर्चना सिंह जया    

Tuesday, September 13, 2016

हरि हो गति मेरी..............गौरी दिवाकर की प्रस्तुति

गौरी दिवाकर अंतर्राष्ट्रीय  स्तर की नृत्यांगना है, आज उसकी पहचान राष्ट्र  में ही नहीं विश्व में भी प्रख्यात है। जैसा कि उसके नाम में ही ख्याति का सार छुपा है। गौरी यानि शिवा, अम्बिका शक्ति की अपार भंडार, दिवाकर यानि सूर्य,भानू जिसकी योग्यता में ही सूर्य-सा तेज फिर किसी भी प्रकार की बाधा उसे अग्रसर होने से नहीं रोक सकी। हर भीड़ को चीरती हुई वह अपने लक्ष्य तक पहुॅंच पाने में सक्षम हो पाई और आज विश्व के कोने-कोने तक अपने शौर्य का पंचम लहरा पाने में सफल हो पाई है। जमशेदपुर से दिल्ली तक का सफर संघर्ष पूर्ण भी रहा पर हौसला कभी थमने को नहीं आया, आज ये उसी मेहनत का परिणाम है। गौरी दिवाकर को 2008 में उस्ताद बिस्मिलाह खॉन युवा पुरस्कार संगीत नाटक एकादमी की तरफ से नवाज़ा गया।



                ये बात उस शाम की है जब मेरा मन प्रेमभाव से यूँ रंग गया था जैसे शहद दूध में, मिसरी जल में घुल जाती है। अगर मैं श्रेय दूॅ तो यह 15 जनवरी 2016, 7.30 की उस शाम को जाता है जहॉं अदिति मंगलदास जी के सानिध्य में मिस गौरी दिवाकर द्वारा प्रस्तुत नृत्य ने श्री राम सेंटर,नई दिल्ली के हॉल में सुफियाना समॉं बॉंध दिया था। मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकती हूॅं कि उस हॉल में उपस्थित सभी दर्शकगण का मन उस पल प्रेम रंग से भींग चुका था। उस संध्या की बेला में समय की गति जैसे मद्धिम हो चली थी, देखने वालों की ऑंखें कौंध-सी गई इसका पूरा श्रेय गुरु बिरजू महाराज जी , जयकिशन महाराज जी  और अदिति मंगलदास जी को जाता है,जिनके आशीष  की छाया सदैव गौरी दिवाकर पर बनी हुई है। साथ ही गौरी की असीम प्रयास व कठिन परिश्रम ही है जो उसे इस मुकाम़ तक पहुॅंचाया।
                         कृष्ण  का प्रेम संदेश जो विश्वविख्यात है उसी संदेश की प्रेम वर्षा नृत्य और संगीत के माध्यम से हो रही थी। नृत्यांगना गौरी दिवाकर की गति हरि की ओर ही हो चली थी, दर्शकगण तन-मन से हरि के रंग में तल्लीन हो रहे थे। श्री समीउल्ला खॉन ने तो अपनी मघुर संगीत का जादू ही बिखेर दिया। गौरी के अन्य साथीगण योगेश गंगानी,आशीश गंगानी व मोहित गंगानी जी का सहयोग भी सराहनीय था। गौरी दिवाकर के हावभाव ,ताल और खॉन जी का स्वर दोनों ही लोगों के तन-मन के तार को झंकझोर रहे थे। नृत्य व संगीत दोनों ही एक रंग हो चले थे, तालियों की गूॅंज हौसले को बुलंद करने का साहस दे रहे थे। नृत्य की गति थमने को नहीं आ रही थी। शाम की वो छटा ने धर्मों के बंधनों से परे कहीं ये  स्पष्ट  करते नजर आ रहे थे कि प्रेम का रंग एक ही है इसका कोई मज़हब नहीं होता । उसका नृत्य अध्यात्म के संपर्क में ला सकने में सक्षम हो चला था। हम इंसान मज़हबों की डोर से इसे बॉंधने की भूल कर जीवन रस का आनंद लेना ही भूल जाते हैं। सच,
         धर्मों के बंधन से ,परे थी वो शाम।
         कानों में रस घोलती स्वर ,थाप व ताल ।
नृत्यांगना की लय-ताल की गति सचमुच हरि की ओर खींचती चली जा रही थी, वो तो पूरी तरह से ‘‘हरि हो गति मेरी ..........’’ में गतिमान हो चली थी,एकाकार हो चली थी। नृत्य की भावाभिव्यक्ति सभी के  हृदय  को छू रही थी, ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सभी उपस्थित लोग हरि हो गति में..... यानि वो भी हरि को समर्पित होते जा रहे थे ,सच इतनी कम उम्र में ही ये महारत हासिल करना अपने आप में ही चुनौति पूर्ण कार्य है। समय-समय पर उसकी प्रस्तुति देश-विदेश में देखने को मिलती है। गौरी जैसी महान कलाकारा स्वयं के साथ-साथ माता-पिता, गुरु व देश का नाम भी रौशन करती है।

                                                                             .....................अर्चना सिंह जया




Thursday, September 8, 2016

बेटी का जन्म ( कविता )

 
न जाने मुझे ये कैसा भ्रम हुआ ?
गॉंव घरों में बॅंटते देख लड्डू
मैंने पूछा,‘आज कैसा शगुन हुआ?’
हॉं,‘आज एक बेटी का जन्म हुआ।’
चलो देर से ही सही,नया पहल हुआ।
बेटी बचाने की जागरुकता तो आई,
मानवता की सोच, कुछ तो बदल पाई।
माता पिता के दिलों में, जश्न  दीप
चहुदिशा  करने लगे प्रदीप्त ।
ये जानकर मन को सुकून हुआ,
बेटियों के सपने भी अब सॅंवरने लगे।
रियो ओलंपिक का प्रभाव देखो हुआ.
सिंधु, साक्षी व दीपा की चाह दिलों में हुई।
बेटियों को मिला सम्मान अपने ही घरों में
और देश विदेश की देखो शोभा हुई।
पुत्री भी कर सकती, वंश का नाम रौशन
जो परिचय दे. वो महिला सशक्तिकरण।
अवनी, भावना व मोहना ने अंतरिक्ष तक
देश के ध्वज को दिया सम्मान,
पिता के दिलों में गर्व ने लिया स्थान,
‘टीना डावी’ जैसी पुत्री ने बढ़ाया मान ।
देश की बालाओं को देकर हाथ
आओ दिखाएॅं उन्हें पाठशाला का मार्ग ।
बेटी को बचाना ही मात्र नहीं है उद्देश्य,
शिक्षित कर उन्हें बनाना है और सशक्त।
पुत्री के जन्म पर भी होंगे नृत्य-संगीत
जनसंचार में लहरा देंगे यह नव संदेश।

                                      ............  अर्चना सिंह ‘जया’

Sunday, September 4, 2016

शिक्षक को प्रणाम ( कविता )

      

गुरुजन हैं मंदिर समान
शिक्षक को शत-शत प्रणाम,
ज्ञान की वे नित ज्योति जलाते
उज्ज्वल हमारा भविष्य बनाते।

सत्य, प्रेम का पाठ पढ़ाते
सदा सन्मार्ग की राह दिखाते,
नेहरु,गॉंधी, वीर सुभाष 
जैसा बनना हमें सिखाते।

कहते विद्या धन है सागर समान
बढ़ती ही जाए जो करो तुम दान
विद्या का करके तुम सम्मान
बढ़ाओ माता पिता व  ,
गुरुजन का मान 
                 
                          -------अर्चना सिंह
            
        03 सितम्बर 2005  राष्ट्रीय  सहारा,‘बाल उमंग’ पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुकी है ।