Tuesday, July 28, 2020

Tum kahan ja rahe ho

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For this poem, (in 50 words)

तुम कहां जा रहे हो?
✍🏻
कुछ दूर ही चला था,
कि काफ़िर नज़रों ने पूछा।
तुम कहां जा रहे हो?
मुस्करा कर कहा,
तंग हैं गलियां यहां,
सोच भी है कुंठित।
हीन हो रही मानसिकता,
मानव हो गया विक्षिप्त।
बेबस हो जीने से अच्छा,
गंतव्य हो और कहीं।
नई सोच, सफ़र नया
प्रश्न न करना फिर कभी।
      .... अर्चना सिंह जया

Thursday, July 23, 2020

सावन मन भावन

सावन मन भावन है।
बरखा की बूंदों में,
शीतल पवन के झोंंकों में,
बादलों के घेरों में,
कोयल के गीतों में,
सावन मन भावन है।
अमिया के झूलों पे,
नदियों के उफान पे,
खेतों की हरियाली पे,
मेहंदी हथेली पे,
सावन मन भावन है।
सखियों की टोली संग,
धानी चुनरी के संग,
खनकती चूड़ियों संग,
छतरी हमजोली संग,
सावन मन भावन है।


Thursday, July 16, 2020

मुझे यकीन है - कविता

                   कविता
                         मुझे यकीन है

मुझे यकीन है
तुम इक दिन समझोगे।
जब आॅंखें कमज़ोर हो जाएॅंगी,
मन का कोना खाली हो जाएगा,
आॅंगन भी सूना हो कोसेगा,
दीवारों में दरारें दिखेंगी,
मुस्कान मेरी तुम खोजोगे।
मुझे यकीन है
तुम इक दिन समझोगे।
गुजरा वक्त याद आएगा,
तन्हा पहर भी ढल जाएगा,
गुलाबी शाम फिर रुलाएगी,
बस धुॅंधली होंगी यादें पुरानी,
आॅंसुओं से होंगी पलकें गीलीं।
मुझे यकीन है।
तुम इक दिन समझोगे,
पुरानी तस्वीरों में ढूॅंढोगे,
रंगोली के रंगों में खोजोगे,
गलियारों सड़को पर
तन्हाॅं गुम हो भटकोगे।
भीड़ में भी रहोगे अकेला
फिर मेरी मोहब्बत को तरसोगे।
मुझे यकीन है।
 
              ........ अर्चना सिंह जया      

Wednesday, July 15, 2020

सुन री सखी

अंतर्मन के द्वंद्व से
हरदिन लड़ रही हूं री सखी।
का से कहूं पीड़ा मन की
बस इसी उलझन में हूं।
टीस सी उठती रह रह,
हिय छलनी है हो रहा।
अश्रु बन लहु देखो,
आंखों से बह रही री सखी।
रिश्तों के ताने-बाने,
रह गए हैं उलझ कर।
गांठें पड़ रही हैं,
गुजरते लम्हों में अब।
मैं रहूं या ना रहूं मगर
सब रहेगा यूं ही री सखी।
जिंदगी जो सिखा गई,
सिखाया नहीं किसी ने।
प्रयास फिर भी कायम रखी,
उम्मीद कभी छोड़ी नहीं।
मन तो कल भी रिक्त था,
आज भी तन्हां है री सखी।







Tuesday, July 14, 2020

अदृश्य नायक

मैं अदृश्य
मुझे देखा नहीं,
मुझे छुआ नहीं,
नायक बन बैठा मैं।
नायक नहीं खलनायक,
ऐसा कहने लगे हैं हमें।
नामकरण भी कर दिया,
'कोरोना' पुकारने लगे सभी।
खुद का गिरेबान झांका नहीं,
क्यों द्वेष,छल कपट, नफरत
हिय में छुपा रखा है तूने ?
इसे मिटाने और तुम्हें सिखाने,
का लिया संकल्प है मैंने।
बहरूपिया बन आता रहूंगा,
संहार करने को यहां।
बुद्धि हीन देख भावना,
हृदय काठ का है हुआ।
इंसानों व रिश्तों से परहेज़
करते देखा फिर जब,
अदृश्य बन अवतरित हुआ,
सिखाने को नया सबब।
मानव ईश की सुंदर रचना
पर कद्र न तुझ से हुआ।
नारी का तिरस्कार किया,
बहन बेटी का बालात्कार ।
कहां गई इंसानियत तेरी,
धरा बिलखने कराहने लगी ।
भाई-भाई में प्रेम नहीं,
मां का अनादर भी किया।
मैं अदृश्य नायक था तेरा
खलनायक बनने को देखो,
वर्षों बाद विवश मैं हुआ।
बुद्धि विवेक भ्रष्ट हुई तेरी,
विष कब से मैं हूं पी रहा।
अपराधबोध तुझे कराने,
विकराल रूप धारण है किया।
जीवन अनमोल है पर
कभी विचार तक नहीं किया।
आत्मावलोकन करने का
विचार मन में क्यों आया नहीं?
दूरियां बढ़ती ही जा रहीं,
घाव दिलों के यहां भरते नहीं।
जो मैंने एहसास ज़रा कराया,
अदृश्य शक्ति मैं हूं कहीं।
विवश हो बिलख रही दुनिया,
फिर भी अहम छोड़ा नहीं।
टूटने को हुआ तत्पर,
झुकने को अब भी तैयार नहीं।
नायक से खलनायक का,
सफ़र है मंजिल नहीं।



 ंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंंं


Tuesday, June 16, 2020

खुद की खुशी


मायानगरी है ये दुनिया ही
नकाब पहना है सबने यहां।
उम्दा कलाकार हैं हमसभी
सच से चुराकर आंखें देखो,
कृत्रिम जीवनशैली को
समझ बैठे हैं वास्तविक जहां।
यथार्थ से होकर दूर हम,
भटक गई हैं राहें जहां।   
औरों की झूठी तसल्ली के लिए
खुद को गिरवी रखते हैं सभी।
मकान बहुत ही सुन्दर है,
ऐसा सभी कहते हैं यहां।
दीवारों पर लगी पेंटिंग,
रंग बिरंगी टंगी तस्वीरें
खूबसूरती को हैं बढ़ाते।
पर मन एक कोना फिर भी
रह गया खाली कहीं यहां।
इसे सजाएं कैसे, कहो अब
खुशियां, ठहाके,रिश्ते,प्यार
सहज मिलते नहीं बाजारों में।
हां, दर्द को छुपाया मुस्कानों से
तनहाई को सजाया गीतों से,
ऊंचाई को छूने की चाहत ने
साथ छुड़ाया अपनों से।
सौहरत,दौलत, मकान, गाड़ियां
पाकर भी मैं रहा अकेला जहां।
विचित्र है ये दुनिया यारों,
सब पाकर भी कभी कभी
खुश नहीं हो पाता मानव यहां।
तलाश खत्म होती नहीं उसकी
खुद को खो देता है वो यहां।
जिंदगी इक पहेली सी
जाने क्यों हरपल लगती यहां?
खुद की खुशी है जरूरी
न करना खुदकुशी कभी यहां।




Thursday, June 4, 2020

धिक्कार है तेरा

मैं गजानन पूजनीय
क्या गुनाह किया मैंने?
हां, शायद बुद्धिजीवी पर
कर बैठा विश्वास मैंने।
नहीं की थी कल्पना कभी
अमानवीय व्यवहार की।
मेरे जीवन के साथ ही
कर बैठा निर्मम हत्या
मेरे गर्भ में पल रहे,
मासूम नन्हें सुमन की।
क्यों कर्म हीन,भाव हीन
हो गया है मानव?
जानवर हैं हम
पशुता का व्यवहार
दर्शाता है तू क्यों?
कब अपराधबोध हो
समझ सकेगा तू ?
उसके ही दुष्कर्म का
परिणाम है आज
प्राकृतिक, जैविक आपदा।
मानव के संग
पेड़-पौधे ही नहीं
पशु-पक्षी,जीव जंतु भी
धरोहर हैं इस धरा की।
बेजुबान हैं हम पर
हिय में है स्नेह अपार।
क्रूरता कितनी भरी है
तेरे हृदय में बता।
धिक्कार है तेरे
मानवता होने का,
शर्मसार कर दिया
आज फिर इंसानियत का।
वैहशी हो चला है मानव
क्यों अधर्मी है हो रहा?
सोच हो चली कुंठित,
व्यवहार में विष घोल लिया।