Tuesday, May 29, 2018

भूमि [ कविता ]

                     
धूप की तपन से
जलती रही मैं भूमि।
तन पर दरारें पड़ती रही,
तड़पती रही स्नेह बॅॅंूद को।
कैसे झूमेगा मयूर-मन ?
बादल आकर चले क्यों जाते?
मन के भाव मेरे,बैरी वो
समझ क्यों नहीं पाते?
मन व्याकुल है,तन है सूखा।
मेरे अंतर्मन को
वे छू क्यों नहीं पाते?
वसुधा को तो प्रिय मेघ
सदा ही थे भाते।
पर यह क्या ?
घन मुझे यूॅं तरसाकर
परदेश को चले हैं जाते।
प्यासा मन, राह तकते रहते
अधीर मन से देखा करते।
नेह कब बरसेगा झरझर ?
धरा पूछती रही प्रतिपल,
‘‘कहो ओ सजन
कब तृप्त होगी भूमि ?
औ’ नाचेगा मयूर मन।’’
भाव हिय में छुपाकर,
मेघ को पुकारती पल-पल।
घन जब छाता अंबर पर,
मन मयूर नृत्य कर उठता
भाव विभोर हो, उस पल।
मन पीहू झूमता रह रहकर,
मेघ देख मन होता आतुर
तन तो भींग गया,पर
मन सूखा ही रहा जर्जर।
मैं भूमि रही प्यासी चारों पहर।
         
              ................  अर्चना सिंह ‘जया‘


Friday, May 18, 2018

My Article is in Samarth Bharat magazine.

Samarth Bharat magazine, First Issue of May2018.




      


Friday, May 4, 2018

अग्नि परीक्षा [ कविता ]

       

बालपन से सिर्फ सुना किया

राधा ,मीरा, सीता, अहल्या की

नानी-दादी से किस्से- कहानियाँ ।

आनंदित हो जाती थी सुनकर

न सोचा, न तर्क किया कभी

बस मौन रहकर सुना किया।

सीता की हो अग्नि परीक्षा,

या हो अहल्या का शिला श्राप।

मीरा ने क्यों विष पिया ?

चाहे हो राधा का विलाप।

बुद्धि विवेक न थी मेरी

बाल्यावस्था में अकल थी थोड़ी।

प्रौढ़ावस्था में मैं जब आई,

चिंतन मनन को विवश हुई।

क्या अग्नि परीक्षा अब नहीं होती?

या अहल्या सी छली नहीं गई कोई,

यथार्थ में भी विष पी रही मीरा,

घर-घर में जी रही है वीरा।

अबला थी तब भी वो शक्ति,

आज सबला बनने की चाह में

कितनी अग्निपरीक्षा है वो देती।

बच्चों के लिए कभी  मौन रहकर,

तो कभी मानमर्यादा को ढ़ोती ।

मिशाल कायम करने की चाह में,

खुद संघर्ष कर सक्षम बन पाती।

चाहत की परवाह किसे,

स्वयं ही जीवन ताना-बाना बुनती।

कलयुग की यह व्यथा हमारी,

इंद्र सा छली, रावण सा कपटी।

मिल जाते हैं हर डगर-गली ,

कहॉं से लाएॅं राम-लखन, केशव ?

कलयुग की व्यथा हुई बड़ी /

सीता ,उर्मिला, मीरा, राधा,

मिलेंगी  हर घर - ऑंगन में यहीं ।

''सम्मान देकर, सम्मान है पाना''

ले शपत, पौरुष तब  आगे बढ़ना।

अग्नि परीक्षा है अब तुझे देनी ,

दुर्गा ,काली ,लक्ष्मी से पूर्व

समझ पुत्री ,वधु ,स्त्री ,जननी /

देवी पूज, शक्ति करता  प्राप्त

नारी शक्ति की पूजा ही नहीं मात्र /

कदम-कदम पर देकर साथ ,

इंसान समझने का संकल्प ले आज /



                                                          ---------   अर्चना सिंह जया
                                               

Friday, April 27, 2018

Topic - Community Development

Awareness Programme by Kriti Foundation ............

                                                                               

My 2nd article is in this magazine......... Archana Singh jaya






Saturday, April 14, 2018

भावांजलि: उत्सव, उल्लास है लाया [ कविता ]

भावांजलि: उत्सव, उल्लास है लाया [ कविता ]:  पर्व ,उत्सव है सदा मन को भाता    ‘खेती पर्व’ संग उल्लास है लाता।  कृषकों का मन पुलकित हो गाया,  ‘‘खेतों में हरियाली आई,  पीली सरसों दे...

Friday, March 23, 2018

शहीदों को भाव पूर्ण श्रद्धांजलि

मातृभूमि ( कविता )

 

आभार प्रकट करते हैं हम
ऐ वतन, तेरा सदा।
तेरी मिट्टी की खुशबू,
मॉं के ऑंचल में है छुपा।
कई लाल शहीद भी हुए,
फिर भी माताओं ने सपूत दिए।
निर्भय हो राष्ट् के लिए जिए
और शहीद हो वो अमर हुए।
आभार प्रकट करते हैं हम
ऐ मातृभूमि, हम तेरा सदा ।
धैर्य ,ईमानदारी,सत्यता, सहनशीलता
भू भाग से है हमें मिला।
खड़ा हिमालय उत्तर में धैर्यता से
धरा की थामें बाहें सदा।
अटल-अचल रहना समझाता
सहनशीलता वीरों को सिखलाता।
कठिनाई से न होना भयभीत
सत्य की हमेशा  होती है जीत।
आभार प्रकट करते हैं हम
ऐ मातृभूमि, हम तेरा सदा।
हिय विशाल है सागर का
दक्षिण में लहराता तन उसका।
नदियॉं दर्पण-सी बहती कल-कल
समतल भूभाग से वो प्रतिपल।
झरने पर्वत से गिरती चलती
जैसे बालाएॅं ,सखी संग हॅसती।
खेत,वन सुंदर है उपवन
भू के गर्भ में छुपा है कंचन।
प्रशंसा कितनी करु मैं तेरी?
भर आती अब ऑंखें मेरी।
विराट  ह्रदय  है मातृभूमि तेरा
सो गए वो यहॉं, जो प्रिय था मेरा।
आभार प्रकट करते हैं हम
ऐ मातृभूमि! हरदम हम तेरा ।      
 
                         ______  अर्चना सिंह‘जया’
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Tuesday, March 13, 2018

Pahla Pyaar ....Story


www.matrubharti,com

My next book ' Pahla Pyaar' ---- Mehandi ki raat .

https://www.matrubharti.com









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