Thursday, December 8, 2016

बेबस लाठी ( कहानी )

                                             
                       
समाज एक व्यक्ति से नहीं बनता बल्कि परिवार, दोस्त व समुदाय से मिलते हुए समाज का निर्माण होता है। समाज में रिश्तों का रुप भी बदलता रहता है। आज के परिवेश में रिश्तों के बीच सॉंसें घुॅंटती नजर आ रही हैं। हमारे ताऊ जी जो कभी बोकारो के स्टेट बैंक में हुआ करते थे, उन्हीं के मित्र मिश्रा जी थे। दोनों में धनिष्ठ मित्रता थी, एक ही शहर ,मुहल्ले में रहा करते थे। किसी समय दोनों ही सरकारी नौकरी में कार्यरत थे, मिश्रा जी सरकारी स्कूल में थे इस कारण कभी कभार उनका तबादला भी हुआ करता था। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते गए ,उन्होंने परिवार एक जगह रखने का निर्णय लिया। इस तरह बच्चों की पढ़ाई में कोई रुकावट नहीें आई।
          ताऊ जी ने जिस सोसाइटी में थोड़े सस्ते में घर लिया था उसी में मिश्रा जी ने भी लेने के विषय में सोचा, ताकि दोनों मित्र एक साथ बुढ़ापे की जिंदगी साथ में बिता सके। उन दिनों घर की कीमत एक दो लाख की थी किंतु अभी उन पर कई जिम्मेदारियों का दायित्व था। मिश्रा जी तीन भाई थे,माता-पिता इलाहाबाद के एक गॉंव में रहते थे। माता जी का स्वर्गवास हुए आठ साल हो रहे थे, पिता जी अब मिश्रा जी के साथ ही रहते थे। मिश्रा जी के दो भाई गॉव पर ही रहकर खेतीबाड़ी संभाला करते थे। सबसे बड़े भाई जरा अस्वस्थ रहते थे,उन्होंने शादी नहीं की थी। मिश्रा जी के बडे़ भाई समय-असमय अनाज व सरसों तेल उन्हें भेजवा दिया करते थे । इस तरह मिश्रा जी को मदद मिल जाया करती थी। यहॉं संस्कार का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता था, भाईयों का आपसी ताल मेल सही था। आज की पीढ़ी मदद करने से पूर्व सोचती है कि मैं ही क्यूॅं ?
      मिश्रा जी की दो बेटियॉं और एक बेटा था, तीनों की पढ़ाई ,बाबू जी की दवादारु व पत्नी की जरुरतों का ध्यान रखते हुए जीवकोपार्जन हो रहा था। तनख्वाह ठीक-ठीक थी किन्तु मिश्रा जी बेटियों की शिक्षा में किसी भी प्रकार से कोई समझौता नहीं करना चाहते थे। उनकी दृष्टि में बेटियों को शिक्षित करना यानि एक अच्छे परिवार व स्वस्थ समाज का निर्माण करना था, वहीं उनकी स्वयं की पत्नी आठवीं पढ़ी हुई थी । मिश्रा जी जिस जमाने के थे उस जमाने में बेटा पिता की बातों को नकार नहीं सकता था, विवाह की इच्छा उसकी है या नहीें, उसकी सोच क्या है? ये सारी बातें कोई मायने नहीं रखती थीं। इस प्रकार मिश्रा जी की शादी ,बस हो गई।
         मुझे बुजुर्गांे को आदर देने का ये तरीका आज तक समझ नहीं आया। क्यों हम अपने ही माता-पिता से मन की बात नहीं कर सकते, उनसे नहीं कहेंगे तो क्या पड़ोसी से दिल की बात करेंगे ? विवाह जैसे बंधन के लिए बच्चों से राय लेना व उनकी सहमति होनी जरुरी क्यों नहीं समझते   थे ? मिश्रा जी पूरी जिंदगी आर्थिक जोड़ तोड़ में ही लगे रहे। पिताजी बीमार चल रहे थे, अचानक ही वे बहुत बीमार हो गए। लीवर कार्य करना बंद कर दिया और ब्लड प्रेशर अत्यधिक कम हो गया। अस्पताल में आई सी यू में भर्ती भी हुए किन्तु वे अगली सुबह भी नहीं देख पाए।
         बाबू जी के देहांत के पश्चात् वे स्वयं को कमजोर महसूस करने लगे। कई कार्यों में उनसे सलाह भी लिया करते थे। बड़ी बिटिया की शादी  की बात जो चल रही थी । एक वर्ष के पश्चात् बड़ी बेटी की शादी कर दी। दामाद कलकत्ता में ही, बैंक में कार्य करता था और परिवार भी शिक्षित व छोटा था। एक बहन थी जिसकी शादी हो चुकी थी, बस बुजुर्ग माता पिता ही थे जो साथ में रहते थे। मिश्रा जी को अच्छी शादी मिल गई थी। उनकी छोटी बेटी भी शादी योग्य हो ही रही थी किंतु बच्चों की पढ़ाई व घर खर्च चलाना एक चुनौती पूर्ण जिम्मेदारी थी।
मिश्रा जी का बेटा, सिर्फ बेटा न कहो, लाडला बेटा तो ज्यादा सही होगा। दो बेटियों के बाद का जो था। बहनों ने भी सिर चढ़ा रखा था। मॉं भी बेटा बेटा करते नहीें थकती थी। समाज में बेटे को बुढ़ापे की लाठी जो माना जाता है। मिश्रा जी तो अपने माता-पिता के लिए अंधे की लाठी साबित हुए, इसी के लिए हम रिश्तों के पौधें को सींचते रहते हैं ताकि एक दिन फल रुपी सुख व छॉंव रुपी सहारा प्राप्त हो। बेटा अखिलेश अभी पढ़ ही रहा था पर उसकी रुचि पढ़ने में नहीं थी। मिश्रा जी सोचा करते थे कि अगर बेटे का ग्रेजुएट हो जाए तो सिफारिश करके किसी भी तरह नौकरी लगवा देंगे। अंततः बेटे ने ग्रेजुएशन कर ही लिया और नौकरी भी आरंभ कर दी। मिश्रा जी कुछ प्रसन्न रहने लगे कि बेटे ने भी कमाना आरंभ कर ही दियां। इसी बीच छोटी बिटिया की शादी की भी बात की शुरुआत हो गई। तीन महीने के बाद का दिन निर्धारित हुआ। छोटी बिटिया की शादी के दौरान बेटे अखिलेश की शादी की भी बातचीत का सिलसिला आरंभ हो गया किंतु मिश्रा जी ने एक-डेढ़ साल का समय मांगा और इस तरह उन्हें भी सॉंस लेने की फुर्सत मिली। इसी के साथ बेटे को डिस्टेंट लर्निंग के कोर्स में दाखिला करवा दिया।
     अब घर कुछ खाली-खाली सा लगने लगा था। पत्नी की भी तबीयत कुछ गड़बड़ रहने लगी थी। एक मॉं से बेटियों का खालीपन सहा नहीं जा रहा था, जैसे घर की रौनक ही चली गई थी। सूनापन काटने को आ रहा था। मिश्रा जी के रीटायरमेंट का समय नजदीक आता जा रहा था तभी उन्होंने घर खरीदने का निर्णय ले ही डाला। ताऊ जी से कह कर तीन कमरे का मकान ले लिया। ताऊ जी के एक मित्र का मकान था उसे पैसे की जरुरत आ पड़ी तो उसने चालू भाव में ही मिश्रा जी को घर बेच डाला। अब वो पल आ ही गया जब मिश्रा जी को अपनी नौकरी को हमेशा के लिए बॉय कहना था। समय जरा दुःखद था पर ये तो सभी के जीवन में आता है। इज्जत के साथ अपने कार्य से मुक्त हुए ये तो गर्व की बात है-ऐसा कह पत्नी ने हौसला बढ़ाया, साथ ही अब मुझे ज्यादा समय भी दे पायेंगे।  इस प्रकार मिश्रा जी अपनी पत्नी व बेटे के साथ अपने मकान में रहने लगे। कुछ ही सालों के पश्चात् बेटे ने अपनी नौकरी भी बदल ली और वह रॉंची चला गया। ताऊ जी और मिश्रा जी एक साथ समय व्यतीत करने लगे।
       मित्रों की राय मानकर बेटे की शादी का निर्णय ले ही डाला। बेटे की शादी आखिरकार तय हो ही गई। लड़की एम ए की हुई थी, अपने घर पर दूसरे स्थान पर थी। उसका एक बड़ा भाई व एक छोटी बहन भी थी। बहु के आने से कुछ दिन घर की चहल पहल बनी हुई थी। मिश्रा जी ने बेटे की शादी का खर्च ही मांगा और दहेज के नाम पर कुछ नहीं । दरअसल मिश्रा जी आर्थिक रुप से बहुत मजबूत नहीं थे। समाज में नाम,मान, प्रतिष्ठा ही उन्होंने कमाई थी। उन्होंने सोचा कि अब समय के साथ साथ बेटे को भी अपनी जिम्मेदारी का एहसास हो ही जायेगा। मुझसे कुछ तो सीखा ही होगा । बहु छह महीने मिश्रा जी के घर पर साथ में रही फिर बेटे के साथ रॉंची चली गई। वहॉं बेटे को भी अकेले रहने में व खाने पीने की तकलीफ थी , इस बात को मिश्रा जी भली-भॉंति समझ रहे थे।      
         वक्त का पहिया तेजी से घूम रहा था। साल गुजरते जा रहे थे, बेटा बहु अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गए, दो बच्चे भी हुए। आकाश व अमन, होली पर व गर्मी की छुट्टी पर दादा-दादी के यहॉं घूमने आते थे। बचपन से ही दोनों शरारती थे। दादी ,अस्वस्थ रहने के बावजूद भी दोनों की खाने पीने की चिंता करती थी। अपने हाथों बेसन के लड्डू व खीर बनाकर खिलाया करती थी। मिश्रा जी बेटे को समझाते कि नौकरी चाकरी पर ध्यान देना अब बच्चों की जिम्मेदारी भी है,आज कल नौकरी मुश्किल से मिलती है। जब उनके जाने का समय आता तो दादा-दादी उदास हो जाते थे। पर समय का चक्र घूम रहा था। वे दोनों फिर से अकेले हो गए, बेटा-बहु बच्चों के साथ वापस चले गए।
            मिश्रा जी पत्नी के साथ सुख-दुख मिलकर बॉंट रहे थे। समय-असमय मिश्रा जी भी खाना बना दिया करते थे। अपने प्रिय मित्र ताऊ जी के साथ सुबह टहलने जाते थे, शाम को कभी कभी साथ में चाय भी पी लिया करते थे। ताऊ जी की दो बेटियॉं ही थीं दोनों ही अपने अपने ससुराल में व्यस्त थीं। ताई जी और ताऊ जी अकेले ही जीवन काट रहे थे, उनके मन में कभी कभी बेटे की कमी खलती थी। ईश्वर ने एक बेटा दिया तो था पर छह महीने में ही भगवान ने अपने पास बुला लिया। बस, इस बात की ही तकलीफ उन दोनों को थी। वरना वे सुखी थे। बुढ़ापे की लाठी की कमी का ये समाज एहसास कराता रहता है।
          एक सुबह अचानक , दरवाजे पर अखिलेश अपने परिवार के साथ आ खड़ा हुआ ये देख मिश्रा जी जरा अचंभित हुए क्योंकि कोई पूर्व सूचना नहीं थी। खैर, बच्चों से घर में रौनक हो गई बहु व बेटे से घर भरा सा लगने लगा। दोनों लोगों की तन्हाई दूर हुई। अब सुबह शाम कोलाहल सा रहने लगा। एक सुबह चाय पीते समय मिश्रा जी ने बेटे से पूछा- और कितने दिन के लिए आए हो? कब तक की छुट्टी है? ये सुन बेटे ने कहा, अभी लम्बी छुट्टी है, मैंने नौकरी छोड़ दी है। यहीं अब नौकरी देखता हॅूं। ये सुन मिश्रा जी के पैरों तले जैसे जमींन ही खिसक गई। उन्होंने पूछा, ‘ऐसी क्या बात हो गई ?तुम्हें बच्चों का भी ध्यान नहीं आया। ’ बेटे ने कहा,-बस जरा बॉस के साथ झड़प हो गई और कुछ नहीं। आज कल तंग ज्यादा कर रहे थे ।’
            ‘उतार चढ़ाव तो जीवन में आते रहते हैं उससे डर कर भागना नहीं चाहिए,’ -मिश्रा जी ने समझाया। एक पोता छठी कक्षा में और एक आठवीं में था, अब उनके दाखिले की चिंता हो गई। साथ ही अखिलेश अपनी नौकरी के चक्कर में भी यहॉं वहॉं जाने लगा। पैसे की जरुरत और परेशानियों के कारण बेटे बहु में लड़ाई भी हो जाती। मिश्रा जी ने जैसे तैसे कर बच्चों का दाखिला तो करवा दिया किंतु बात यहीं आ कर नहीं रुकती थी। बेटे की नौकरी की चिंता सबसे बड़ी थी। दो महीने के पश्चात् बेटे की नौकरी लगी, वो भी घर से बीस किलोमीटर दूर। खैर ,ईश्वर की इच्छा। मिश्रा जी तो हर बात पर तैयार थे किन्तु फिर भी घर में बहु और सास में भी अनबन रहने लगी। सब्जी भाजी, दूध व राशन तक लाने की जिम्मेदारी भी इस उम्र में मिश्रा जी निभा रहे थे।
            उनका सुखद जीवन अब दुखदाई होने लगा। आए दिन घर में मनमुटाव होने लगे। मिश्राइन जी अब और अस्वस्थ रहने लगीं, कुछ दिमागी बीमारी होती जा रही थी। बहु की जुबान में तेजी आने लगी। दोनों पोते भी बतमीज होते जा रहे थे। बेटे को सारी बातें नज़र तो आ रहीं थी लेकिन वो अपनी कमी को छुपाने की कोशिश में अपनी जिम्मेदारी से मुॅंह मोड़ रहा था। दिन प्रतिदिन घर का कलह बढ़ता ही जा रहा था। नौबत यहॉं तक आ गई कि बहु ने सास-ससुर का खाना बनाना ही बंद कर दिया। बेटा नई नौकरी को लेकर व्यस्त रहने लगा,दो तीन दिनों के लिए उसे बाहर भी जाना पड़ता। गुस्से में कभी कभार मॉं और पिता जी को कहता कि मैं आप लोगों की समस्या को ही सुलझाता रहा तो नौकरी क्या खाक करुॅंगा ? अब अपने ही घर में मिश्रा जी मुॅंहताज होते जा रहे थे। जबकि घर मिश्रा जी का, रासन पानी भी मिश्रा जी का ही इसके बावजूद भी जब बहु नाश्ता बना कर हटती तब मिश्रा जी नाश्ता बनाते , अपने और पत्नी के लिए। दोनों वक्त के खाने का भी यही हाल था। इस तरह घर में रहना भी दुभर होता जा रहा था। रिश्तों में घुटन महसूस होने लगी थी।
            ताऊ जी मिश्रा जी के हालात को देखते हुए सोचने पर विवश हो जाते कि अच्छा ही हुआ जो ईश्वर ने बेटा नहीं दिया,ये दिन देखने से तो बच गया। मिश्रा जी का दुःख तो मेरे दुःख से भी बड़ा है। अखिलेश को घर की परिस्थितियों को समझ कर उसका समाधान खोजना चाहिए। अपनी पत्नी से बात कर उसे समझाना चाहिए। पर ऐसा कुछ भी नहीं था। एक ही घर में एक ही छत के नीचे अजनबियों की तरह रहना क्या होता है ?ये कोई मिश्रा जी से पूछे। अपने ही बेटा-बहु अब पराये से लगने लगे। अखिलेश से कई उम्मीदें जुड़ी हुई थीं, पर उसे बिखरते देर न लगी। बेबस लाठी-सा वह प्र्रतीत हो रहा था। मेरा ये मानना है कि विवाह के बाद बेटे का दायित्व बढ़ जाता है कि मॉं पत्नी, पिता पुत्र के बीच के रिश्तों को होशियारी से संभाले व उचित निर्णय ले।
           अखिलेश की आर्थिक स्थिति सही नहीं थी वह पूर्ण रुप से सक्षम नहीं था। अपने पिता से समय-असमय मदद भी लिया करता था। पत्नी इस कारण उस पर भी अपना क्रोध निकाला करती थी,घर पर दबदबा बना रहे इसलिए उल्टी सीधी हरकतें भी करती थी। घर की शांति भंग हो चुकी थी, बेटा मॉं बाप के पक्ष में कहे या पत्नी के पक्ष में कहे निर्णय लेने में वो असक्षम था। मिश्रा जी की भी उम्र बढ़ती जा रही थी वो खुद को संभालते हुए अपनी अस्वस्थ पत्नी की भी सेवासुश्रा कर रहे थे। डॉक्टर के अनुसार पत्नी के दिमाग में जाल-सा बन बया था। इस अशांत माहौल में बेटियॉं भी आने को तैयार नहीं होती थीं क्योंकि वो घर अब पिता का कम भाई का ज्यादा लगता था।
             एक सुबह अचानक ही मिश्रा जी की पत्नी का निधन हो गया। बेटियों को भी सूचित किया गया। बेटी-दामाद व अन्य रिश्तेदार आए, अड़ोसी-पड़ोसी भी एकत्रित हो गए ताकि अंतिम दर्शन कर सकें। लेकिन ये क्या ,मिश्रा जी की बहु अंतिम दर्शन को भी बाहर नहीं आई। रिश्तों को समझने वाले और उसकी कद्र करने वाले मिश्रा जी आज कितने शर्मिंदे थे। बेटा अखि भी बेबस सा खड़ा रो रहा था,ऐसी परिस्थिति में वो क्या करे और क्या न करे ? ताऊ जी मिश्रा जी को ढ़ांढ़स बंधा रहे थे,सब राम की लीला है । हम सबको अब उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। बेटियॉं फूट-फूटकर रो रहीं थी। पर वक्त किसके लिए रुका है ?इस तरह दिन गुजरते गए, तेरह दिन के पश्चात् रिश्तेदार सभी चले गए।
            मिश्रा जी अब स्वयं को बहुत अकेला महसूस करने लगे, ताऊ जी के साथ सुबह और शाम कुछ समय बिताने लगे। सुबह उन्हीं के साथ दूध लाने व सब्जी लाने जाते थे। जब पत्नी स्वस्थ हुआ करती थी तब दोनांे ही जाया करते थे, अब तो ये सब एक स्वप्न जैसा हो गया था। इधर ताऊ जी घर में ही गिर पड़े,ये सुन दोनों बेटियॉं आ पहुॅंची। मिश्रा जी मेडिकल की दुकान से दवा ले आए। तभी मिश्रा जी ने ताऊ जी से पूछा लोग कैसे कहते हैं कि बेटा बुढ़ापे की लाठी होता है,फिर मेरी लाठी इतनी कमजोर व बेबस क्यों है ? देखो ये तुम्हारी बेटियॉं नहीं बेटे हैं। हॉं,सही कहा तुमने -ऐसा कहते ही ताऊ जी की ऑंखें भर आईं और फिर ताऊ जी का हाथ पकड़ते हुए मिश्रा जी ने कहा,‘ बेटे की चाहत और फिर उससे जुड़ी उम्मीदें ही हमें दुर्बल बनाती हैं।’ ये बात आज समझ आई है।

                                                                    ...........अर्चना सिंह‘जया’

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