Sunday, August 28, 2016

गुलाब ( कविता )



गुलाब को जब मुस्कुराते देखी,
पूछी, ‘कैसे रहता है तू
इतना खुश सदा ?’
समीर की बाहों में है झूलता,
कॉंटों संग रहकर मंद मुस्काता,
जीने का ढंग हमें है सिखाता।
इस पर बोल उठा गुलाब,
‘किस्मत को क्यों रोऊॅं
जो कॉंटें मिले हों दामन में ?’
जो मिला जैसा मिला,
बहुत है मिला मुकद्दर से।
रंग मिला, खुशबू मिली,
कोमलता भी है बनी हुई।
बालाओं के सिर पर सजता ,
देवों के चरण भी छुआ करता।
सुन गुलाब की बातें हुई चकित मैं।
दिन का रिश्ता रात से है जैसा,
सुख और दुःख का भी
रिश्ता है कुछ वैसा।
कॉटे ने सुनी जब बातें
बोला वो भी मौन त्याग कर,
‘मसल नहीं सकता तुझे कोई
लहू के रंग हाथ रंगेगा।’
‘रक्षक हूॅं मैं तुम्हारा प्रिये,
दिलाता हॅूं विश्वास ये।’
गुलाब और कॉंटें की सुनकर
उनका रिश्ता समझ में आया।
भावुक हो, की शीश नमन मैं,
गुलाब संग कॉंटे का होना,
जीवन को दिखता है आईना।
                   
                                   ----------------अर्चना सिंह जया

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