सागर ऊर्मि की तरह मानव हृदय में भी कई भाव उभरते हैं जिसे शब्दों में पिरोने की छोटी -सी कोशिश है। मेरी ‘भावांजलि ’ मे एकत्रित रचनाएॅं दोनों हाथों से आप सभी को समर्पित है। आशा करती हूॅं कि मेरा ये प्रयास आप के अंतर्मन को छू पाने में सफल होगा।
Friday, February 6, 2026
ज़िंदगी सिखाती
ज़िंदगी तेरा शुक्रिया,
जो दिया जितना दिया,कर्ज कैसे हो अदा।
जीवन मार्ग पर प्रशस्त करूँ,
ले हृदय में प्रेम-सद्भाव-करुणा और दया।
आजीवन जिंदगी सिखाती हमें,
ये है एक अद्भुत पाठशाला।
ज़िंदगी तेरा शुक्रिया,
मुश्किल वक्त में साथ मेरा दिया।
कभी तपती धूप में छाँव उम्मीद की,
औ' गम की बारिश में छतरी आत्मविश्वास की।
इक पहेली सी जब भी लगी ज़िंदगी,
मनोबल टूटने न दिया,ज़िंदगी तेरा शुक्रिया।
शिक्षाएं ज़िंदगी की होती अजीब,
गिर कर उठना सिखाती-ठोकर में संभलना।
आजीवन शिक्षा प्राप्त करता है मानव,
हर गलती से कुछ न कुछ सीखता ही है मानव।
शिक्षा संवारती है ज़िंदगी को,
धैर्य, मनोबल व आत्मविश्वास देती है सबको।
Thursday, May 15, 2025
आप्रेशन सिंदूर पर कविता वर्तमान परिस्थितियों को व्यक्त करती हुई।
आतंकवादियों को ललकारने,
दहशत दिल में जगाने आया 'आप्रेशन सिंदूर'।
मां-बहन-बहुओं के आंसुओं का मान रख,
हुंकार लगाने लो आ गया 'आप्रेशन सिंदूर'।
दहशतगर्दों व दोगलों की नींद उड़ानें,
दुश्मनों को धूल चटाने वो आया 'आप्रेशन सिंदूर'।
छेड़-छाड़ तुमने की है, तो मानवता का
सबक सिखाने पांव पसारा है 'आप्रेशन सिंदूर'।
नापाक इरादों को मिटा, बुरा का अंजाम बुरा होगा
जैसे को तैसा मिलेगा समझाया 'आप्रेशन सिंदूर'।
पाक का हृदय चीर दुशासनों को रौंदा,
अहम् को चूर चूर करने देखो आया 'आप्रेशन सिंदूर'।
हिंद देश का हर नागरिक हिंदुस्तानी है,
'गर्व है हम हिन्दू हैं' यह समझाने आया 'आप्रेशन सिंदूर'।
Monday, August 26, 2024
Sunday, August 25, 2024
कैसी दरिंदगी
मानव होकर मानवता को करते शर्मसार,
हैवानियत दिखती तुम सब की आंखों में,
चेहरे पर मुखौटे पहने घूमते हैं दरिंदे सरेआम।
कब तक छुपकर बैठे बेटी-बहन घरों में,
क्या पढ़े-लिखे नहीं, डाक्टर-इंजीनियर बने नहीं ?
"बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ" स्लोगन है मात्र,
खौफ में रहती ज़िंदगी सदा उसकी।
समय-असमय सड़कों गली-मुहल्लों में,
बहु-बेटियों की आबुरू लूटते हो खुलेआम।
'ये कैसी तृष्णा है बेटे'-पूछती है जननी बार-बार।
अपनी किस मानसिकता का परिचय हो देते ?
क्यों माँ की कोख को कलंकित हो करते?
दुर्गा-सरस्वती समान बेटी-बहन को रौंध,
कैसा यह पुरूषार्थ तुम हो जताते।
कैसी दरिंदगी है चरित्र में तुम्हारे,
बेटों के परवरिश पर उठते हैं कई सवाल खड़े।
मैं अभागिन तेरी आँखों पर जाने कब चढ़ गई,
वो रात काली डराती,खुद की परछाई से भी अब डरती।
खौफ में है जिंदगी हमारी गुहार सुन, हे गिरधारी!
वरना हमें ही बनना होगा शत्रु नाशिनी, दुर्गा या काली।
Tuesday, August 20, 2024
अंधकार. में अंतर्मन
वेदनाओं के भँवर में घिरता जाता है मन,
गहन अंधकार में खोने लगता अंतर्मन।
क्या करूँगी जन्म लेकर इस समाज में,
कोई देखना ही नहीं चाहता मेरा मन दर्पण।
चीर हरण कर सहजता से घूमता है आरोपी,
क्या कहें मानवता की नज़रें भी हैं झुकी,
आक्रोश व्यक्त करो युवाजन चीर दो जंघा दुशासन का,
चौराहे पर तार-तार कर दो उसका जीवन।
मोमबत्ती लेकर सड़कों पर चलने से मात्र,
कुछ नहीं बदलेगा इस पुरुष प्रधान समाज में।
जहाँ बेटियों के लिए सारे आदर्श ज्ञान की बातें,
बेटों से क्यों नहीं पूछते कुछ प्रश्न कभी,
" कहाँ थे इतनी देर तक,
क्या कर रहे थे आधी रात सड़कों पर "।
"बेवजह यारों संग आवारागर्दी क्यों करते हो ?
और हर बात के पीछे मां-बहन की गाली क्यों देते हो ?
गर आधी रात तुम घर पर रहते जो शायद,
तो असमय नहीं होते गली-मोहल्ले में वारदात।
गर्भ में भी मारी जाती हैं बेटियाँ,
बहू चाहिए, वंश भी फिर बेटियों से इतनी नफ़रत क्यों?
कब तक न्याय की गुहार लगाती रहेगी,
कभी समय पर, कभी कपड़े पर प्रश्न कर
बेटियों को ही दोषी मानकर मुँह फेरते हो क्यों ?
बुरी नज़र, बुरी सोच वाली मानसिकता हो जिनकी
वो तो नहीं रहम करते, चाहे बिटिया हो तीन वर्ष की।
यानि कोई बेटी, बहन चौखट से बाहर सुरक्षित नहीं।
माँ की कोख शर्मसार हो रही,
कैसे कुपुत्र को जन्म दी वो, घोर वेदना भी सही वो।
खुद से वो करती सवाल बार-बार।
व्यथित मन मस्तिष्क में कौंध रहे अनगिनत सवाल।
बेटे में भी बोना होगा संस्कार के बीज,
ताकि मां की कोख को न सुनना पड़े कोई गाली कभी।
नारी की पूजा होती जिस देश में,
बेटी-बहन भी है धरोहर मातृभूमि की।
अब तो सौगंध खा मां, माटी, मानुष की, कि
ममता-प्रेम-स्नेह अपार धारण करेगा हिय में तू।
Friday, February 23, 2024
Poem on Valentines day
मोहब्बत की राह https://www.zorbabooks.com/spotlight/archanasingh601gmail-com/poem/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%b9%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%b9/
Tuesday, January 23, 2024
दिल्ली की सर्दी
दिल्ली दिल वालों की है जनाब, चाहे कोहरे बिछे हों राह
सड़क किनारे टिक्की-चाट,कुल्फी आइसक्रीम लेकर हाथ।
शीतल पवन तन-मन को छूती, सर्दी का कराती है एहसास
बच्चे,जवान, बूढ़े को फिर भी दिल्ली की सर्दी आती रास।
रह-रहकर दिल्ली-सर्दी,शिमला-नैनीताल की याद दिलाती
युवाजन फैशन के वशीभूत जैसे, सर्दी उनको छू कहाँ पाती?
पर, गरीब बेचारे दो वक्त-रोटी के मारे सर्दी उन्हें नहीं सुहाती,
तन ढकने को वस्त्र नहीं, क्षुधा अग्नि भी ठंड से कहाँ बचाती?
दिल्ली की सर्दी में पशु-पक्षी-मानव शीत लहर की मार खाते
गरीब,बेघर,बेचारे दाल रोटी, चादर कंबल को तरसते हैं सारे।
सर्दी अब रहम कर जीव-जन्तु संग मानव भी होगी आभारी।
कोहरे-धुंध में रो रही मजबूर-असहाय-गरीब जनता बेचारी।
मंगल गीत गाओ
गाओ री मंगल गीत सखि, आया राम महोत्सव, ढ़ोल-मंजीरे लाओ री सखि। जय राम,श्री राम में रम जाओ री सखि।
Wednesday, June 21, 2023
जिंदगी
Friday, September 23, 2022
उम्मीद की लौ
जीवन में हो तमस घना, तो उम्मीद की लौ जला लेना।
निराशा के तम को कभी ना, दिल का कोई कोना देना
आशा-उम्मीद के दीपक से कठिन राह जगमग कर लेना।
हिय में छुपाए आत्मविश्वास को तू बोझिल ना होने देना,
किसी रोते को हँसाकर भी,अपना मन हल्का कर लेना।
रात्रि के पश्चात ही नई आशा का सूरज सदा उदय होता,
जुगनू से सीख गहन अंधेरे में भी कैसे है चलते रहना,
जीवन में हो तमस घना, तो उम्मीद की लौ जला लेना।
जिंदगी के सुहाने सफर में, धूप-छाँव से ना कभी डरना।
बाहर के अंधकार से पूर्व, मन के तिमिर को दूर करना।
ज्ञान की मशाल जलाए चल, कर रौशन जग का कोना
अज्ञान के तम को मिटा, मानवजन को जागृत करना।
लोभ-ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट-अहम् का दहन कर देना,
दया-प्रेम-सद्भाव का दीप प्रज्ज्वलित कर चलते रहना।
जीवन में हो तमस घना, तो उम्मीद की लौ जला लेना।
Tuesday, August 30, 2022
न्याय की गुहार
Sunday, May 8, 2022
मां
मां ऐसी होती है।
अपने अश्रु को छुपा,
सदा मुस्कान बिखेरती है।
अपने सपनों को दफना कर
बच्चों को स्वप्न पर देती है।
मां ऐसी होती है।
अपनी थाली को परे रख
बच्चों को भोजन परोसती है।
अपनी नींद से हो बेपरवाह
बच्चों को लोरी-थपक्की देती है।
मां ऐसी होती है।
हाथों के छाले को ढंक कर,
चाव से रोटी सेंका करती है।
स्वयं के भावों को छुपा
बच्चों के जीवन में रंग भरती है।
मां ऐसी होती है।
बिस्तर गीला गर हो मध्य रात्रि
सूखे नर्म बिस्तर हमें देती है।
तेज़ तपते हुए ज्वर में
पानी की पट्टी रख सिरहाने होती है।
मां ऐसी होती है।
जाने कैसे वह बिन कहे
मन के भाव सदा पढ़ लेती है।
गर अंधियारा छाये जीवन में
थाम हाथ राह रौशन करती है।
मां ऐसी होती है।
कभी सख्त मन से डांट लगा
खुद भी रोया करती है।
कभी नीम सी कड़वी तो
कभी शहद सी मीठी बातें करती है।
मां ऐसी होती है।
मां धरती सी,कोमल पुष्प सी
चंदन बन महका करती है।
हिय विशाल है उसका जहां
ममता,स्नेह,प्रेम,दया,क्षमा समेटे रखती है।
* अर्चना सिंह जया,गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश
मां ऐसी होती है।
Wednesday, January 5, 2022
Wednesday, December 29, 2021
मैं और मेरी चाय
" मैं और मेरी चाय "☕
मैं और मेरी चाय आपस में अक्सर ये बातें करती हैं,
तन्हाई में सवाल, मुझसे पूछा करती है।
मैं नहीं होती तो प्रातः,तू करती किसका इंतज़ार ?
कोमल हाथों के स्पर्श का प्रतिदिन, मुझे रहता इंतज़ार।
होंठो से लेती हर सिप में महसूस होता है प्यार ,
सिर्फ तुम्हें ही नहीं मुझे भी रहता, तुम्हारा इंतज़ार।
मैं सिर्फ चाय नहीं ,हूँ तुम्हारा प्यार, संगी साथी, सहचर,
तुम्हारे सुख में और दुख में भी नहीं छोड़ती साथ।
सच ही कह रही हो - डीयर चाय
बिस्कुट, सैंडविच,आलू पराठे,पकौड़े संग भी
निभाती आई हो अपना साथ।
गुन गुनी गर्मागर्म भाती हो हर बार,
शीत काल में तुम सा नहीं कोई यार।
जितनी भी तारीफ करूँ कम लगती हर बार ,
रिश्तों से मिले दर्द अपनों से मिली रुसवाई में भी
कभी भी प्याली ने नहीं छोड़ा साथ।
चाहे ऋतु हो जो कोई भी या हो दिन-रात,
थाम हाथ में महसूस होता,
जैसे दूर करती हो तन्हाई और हर लेती पीर।
अंतर्मन पुलकित हो उठता और
आंखों में झलक उठता मधुर प्यार।
मैं और मेरी चाय प्यारी,हमजोली है मेरे जीवन की।
Thursday, September 2, 2021
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी
" मैं तुम्हें फिर मिलूँगी "
मुझे है यकीन ,मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।
अगले जनम में ही सही माँ,
तेरी कोख से ही जन्मूँगी।
माना कि तू मजबूर थी,
सामाजिक कुरीतियों की शिकार थी।
पर मेरा क्या दोष बता माँ,
क्यों जग को नहीं भाया मेरा आना?
मुझे भी था खेलना दौड़ना,
देखना था बाबुल का अंगना।
आंगन की धूल भी तो न ले जाती,
मायका- सासरे को सँवारती।
काश! मैं भी पहन जो पाती,
पिया के हाथों सुहाग का कंगना।
मुझे है यकीन,
मैं तुम्हें फिर मिलूँगी।
आवाज लगाना माँ तू मुझको,
तेरी परछाई बनकर लौटूँगी।
लड़ना है अपने अधिकार की खातिर,
संग-संग तेरे अस्तित्व का भी मान रखूँगी।
बाबा का ही मात्र नहीं माँ,
गाँव,शहर,राष्ट्र का नाम रौशन करूँगी।
पुत्र के संग-संग मैं पलूंगी,
पुत्री हूं, घर की फुलवारी में सजूँगी।
भ्रूण हत्या न करना बाबा,
ईश्वर से मांग लाना मुझको,
माफी मैं खुश होकर दे दूँगी,
हाँ, मैं तुम्हें फिर जरूर मिलूँगी।
Wednesday, May 26, 2021
वो आखिरी सफ़र कविता
वो आखिरी सफ़र...
नहीं कुछ अपना है जहां,
जुटाने में निकल गई जिंदगी वहां।
हर इक लम्हा कुछ धूप-छांव सा,
सुख दुःख संग गुजरता गया कारवां।
वो आखिरी सफ़र थी,
जिंदगी की चंद सांसें बचीं थीं जहां।
जीवन चादर के ताने-बाने में,
सुबह से शाम फिसलती हुई जिंदगी।
जुटाया भी, जुगाड़ भी करती गई,
फिर भी यथार्थ में,
खाली हाथ आई जिंदगी।
वो आखिरी सफ़र...
तोड़ा मरोड़ा वक्त ने हमें हर लम्हा,
अनोखा एहसास हुआ तो हमें भी।
कुछ सुनी अनसुनी है कहानियां,
बहुत कुछ सीखा गई जिंदगी।
वो आखिरी सफ़र,
अपनों से दर्द, गैरों से शिकवा
ज़ख्मों पर नमक छिड़क रही थी।
जीवन का नया तजुर्बा देकर,
आगे आगे चलती गई फिर भी जिंदगी।
कुछ स्वप्न पूरे, कुछ अधूरे ही,
रंगों से दूर हो रहे थे अरमान सभी।
वो आखिरी सफ़र था,
हमने भी आंसू पोंछे और
हंसकर कहा अलविदा जिंदगी।
दोबारा जो कभी मुलाकात हो भी गई,
अनजान बन, पहचानना न फिर कभी।
Tuesday, March 16, 2021
पश्चाताप कहानी
"पश्चाताप" कहानी प्रकाशित हो चुकी है।😊 https://www.ekalpana.net/post/archanasinghmarch2021story
मेरी स्वरचित व मौलिक रचना जिसे सराहा गया।
Monday, March 8, 2021
नारी तू सशक्त है - कविता
" नारी तू सशक्त है"
न विचार विमर्श की है गुंजाइश।
निर्बल तो वह स्वयं है,
जो तेरे सबल होने से है भयभीत।
नारी तू सशक्त है।
धर्म-अधर्म की क्या कहें?
स्त्री धर्म की बातें ज्ञानी हैं बताते
पुरुष धर्म की चर्चा कहीं,
होती नहीं कभी अभिव्यक्त है।
नारी तू सशक्त है।
देवी को पूजते घरों में,
पर उपेक्षित होती रही फिर भी।
मान प्रतिष्ठा है धरोहर तेरी,
अस्तित्व को मिटाती औरों के लिए
नारी तू सशक्त है।
तू ही शारदा ,तू लक्ष्मी,तू ही काली
धरा पर तुझ-सी नहीं कामिनी।
तेरे से ही सृष्टि होती पूर्ण यहाॅं,
भू तो गर्व करता रहेगा सदा।
नारी तू सशक्त रही
और तू सशक्त है सदा।
------------- अर्चना सिंह जया
' 8 मार्च अंतर्राष्टीय महिला दिवस ' पर सभी नारियों को समर्पित 💐





