💐ज़िंदगी💐
क्या गलत है, क्या सही है? समझ नहीं पायी थी ज़िंदगी ,
जीवन के चैराहे पर तन्हाॅ, कश्मकश में थी सहमी ज़िंदगी।
छाॅंव-धूप सी, आग-पानी सी और बारिश में इंद्रधनुषी सी,
कभी प्यारी सी लगे है जिं़दगी, तो कभी अनबुझ पहेली सी।
नन्हें करों से चलते-चलते, कदमों पर चल पड़ी यूॅं जिं़दगी,
चार पहर कब लम्हों ,दिनों, वर्षों में तबदील हो गई जिं़दगी।
सपनें दिखाती, उड़ना भी सिखाती, दूर कर देती है जिं़दगी,
पल पल का हिसाब है रखती, जाने कब छल गई जिं़दगी।
वादा किया था उम्र भर का, क्यूॅ रुसवा कर गई तू जिं़दगी,
मझधार में लाकर हाथ है छोड़ा, ख़ता तो मेरी बता जिं़दगी।
😊😊
............................. अर्चना सिंह‘जया’



